कलह समाप्त करने का उपाय

कलह समाप्त करने का उपाय

कौसाम्बी के भिक्षुओ की कथा

एक बार कौसाम्बी में विनयधर और धर्म कथिक भिक्षुओ में विनय के एक छोटे से नियम को लेकर झगडा होने लगा | बुद्ध ने बहुत कोशिश की कि किसी प्रकार दोनों पक्षों में सुलह कराई जाए पर वे सुलह नहीं करा पाए | अत: उन्होंने उन्हें कुछ और अधिक कहना उचित नहीं समझा | वर्षाकाल बिताने के लिए पारिलेयक वन में रकिखत गुफा में चले गए | वहां हस्तिराज पारिलेयक ने उनकी खूब सेवा की |

बुद्ध के वन प्रस्थान के बाद नगरवासियों को पता चला कि बुद्ध वन क्यों गए | अत: उन्होंने भिक्षुओ को दान देना बंद कर दिया | अब भिक्षुओ को अपनी गलती का एहसास हुआ | उन्होंने आपस में सुलह किया | फिर भी उपासगन उनके प्रति उसी श्रध्दा से पेश नहीं आ रहे थे जैसे वे पहले पेश आते थे | उपासगण की सोच थी कि इन भिक्षुओ को अपनी गलती स्वीकार कर शास्ता से माफ़ी मांगनी चाहिए | लेकिन बुद्ध तो वन में थे और यह वर्षाकाल का समय था | भिक्षुओ की बड़ी दुर्दशा हुइ | वर्षाकाल बड़ा ही कस्टमय बिता |

वर्षाकाल के बाद भंते आनंद उन भिक्षुओ के साथ वन में गए और बुद्ध से विहार लौटने का आग्रह किया | उन्होंने अनाथपिंडीक एव अन्य उपासकों की पार्थना भी सुनाई और बौद्ध विहार वापस चलने कि विनंती की | बुद्ध मो महा कारुणिक है | उन्होंने उनकी पार्थना स्वीकार कर ली और बौद्ध विहार वापस लौट आए | सभी भिक्षु उनके चरणों पर गिर पड़े और अपनी गलती के लिए क्षमा मांगने लगे | बुद्ध ने उन्हें उनकी गलती का एहसास कराया और समझाया कि उन्हें सदैव यद् रखना चाहिए कि सबों की मृत्यु एक ना एक दिन अवश्य होंगी | अत: आपस में कलह करने का कोई औचित्य नहीं है |

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