काषाय वस्त्र का अधिकारी कौन ?

 काषाय वस्त्र का अधिकारी कौन ?

 देवदत्त की कथा

एक बार अग्रस्त्रावक सारिपुत्र तथा महामोग्लान अपने भिक्षुओं के साथ राजगृह में चारिका के लिए निकले | राजगृह वासी उन्हें दो, तिन या बड़े समूह में दान देने लगे | भंते सारिपुत्र ने उन्हें दान की महिमा समझाते हुए बताया ,

  • “ कोई व्यक्ति अगर स्वयं दान तो करना है पर दुसरो को दान के प्रति प्रेरित नहीं करता, वह अगले जन्म में में स्वयं तो भोग – ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता है परंतु परिवार – सम्पति प्राप्त नहीं करता |
  • कोई व्यक्ति जो स्वयं दान नहीं करता पर दुसरो को दान देने के लिए प्रेरित करता है वह अगले जन्म में परिवार सम्पति प्राप्त कर लेता है पर स्वयं कोई भोग – ऐश्वर्य प्राप्त कर नहीं करता |
  • जो व्यक्ति न तो स्वयं दान देता है और न दुसरो को दान देने के लिए प्रेरित करता है वह अगले जन्म में न तो कोई परिवार सम्पति प्राप्त करता है और न स्वयं कोई भोग – ऐश्वर्य प्राप्त करता है | उसे भोजन भी दुर्लभ हो जाता है |
  • इसके विपरीत चौथे किस्म का आदमी वह होता है जो स्वयं भी दान देता है और दुसरो को भी दान देने के लिए प्रेरित करता है | एसा व्यक्ति अगले जन्म में सैकड़ो, हजार गुना भोग – ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता है और साथ साथ उसी मात्रा में परिवार-सम्पति भी पाता है और इन भोगों का उपभोग भी करता है | “

दान की महिमा सुनकर एक समझदार पुरूष ने विचार किया, “ दान की महिमा बड़ी ही अपरंपार है | क्यों न भोजन के लिए भिक्षुओ को निमंत्रित किया जाए ?” यह सोचकर उसने भिक्षु संघ को अपने आवास पर अगले दिन भोजन के लिए निमंत्रित किया तथा घर-घर घूमकर लोगो से दान ले लिया, जिससे भोजन-व्यवस्था अच्छी तरह हो सके | किसी धनि व्यक्ति ने उस उपासक को एक बहुमूल्य कपड़ा देते हुए कहा, “ अगर भोजन-दान का आयोजन करने में पैसे की कमी पड़ जाए तो इस बहुमूल्य कपड़े को बेच देना और उस पैसे से बची हुई कमी पूरी कर देना | अगर कमी न पड़े तो फिर इस कपड़े को किसी योग्य भिक्षु को दान कर देना |”

कार्यक्रम का आयोजन ठीक से हो गया | किसी चीज की कमी नहीं पड़ी | तब उस उपासक ने अन्य दानकर्ताओ से कहा, “ दान कर्म बिना पैसों की कमी के पूरा हो गया | इस कपड़े को किसे दिया जाए ? “ किसी ने सुझाव दिया , “ स्थविर सारिपुत्र ही इसके योग्य है |’’ किसी अन्य ने कहा, “भिक्षु देवदत्त धन पकने के समय से ही हम लोगो के साथ रह रहा है, अत: यह वस्त्र उसे ही दे दिया जाए |” विचार-विमर्श हुआ | बहुमत भिक्षु देवदत्त के साथ था | अत: वह वस्त्र देवदत्त को दे दिया गया | देवदत्त के पास काषाय की कमी नहीं थी | भिक्षु संघ का नियम था कि अगर किसी को इस प्रकार का दान मिल जाता है और उसके पास पहले से काषाय है तो फिर उस वस्त्र को संघ को दे देना पड़ता था | जिस भिक्षु को वस्त्र की आवश्यकता होती, वह वस्त्र उसे ही दे दिया जाता | देवदत्त ने उस वस्त्र को भिक्षु संघ को नहीं दिया | वरन उस वस्त्र को लेकर उसे अपने अनुरूप कटवाकर, सिलवाकर और रंगकर धारण करने लगा |

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