किसके चित्त में राग घुसता है ?

किसके चित्त में राग घुसता है ?

नन्द स्थविर की कथा

राजकुमार सिद्धार्थ गृहत्याग (महाभिनिष्क्रमण) के बाद छ: वर्षो तक गहरी साधना करते रहे और अंततः उन्होंने बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे सत्य के दर्शन किए |

इन अनेक वर्षो में महाराज शुधोद्न शाक्य –नायको के मध्य खिन्न मन से किस प्रकार दिन काटते रहे कोई नहीं जनता | यशोधरा ने भी अपने –अपने तरीके से राजकुमार सिद्धार्थ की खूब खोज –खबर करवाई, पर सब व्यर्थ गई | एक दिन यशोधरा के मुह से जब यह बात निकली कि ‘अब मै थोड़े दिन की मेहमान हू ‘तब ही अनुचरियो ने सूचना दी कि नगर के दक्षिण तोरण से आए दो व्यापारी कह रहे है कि उन्होंने ‘शाक्य कुमार’ को देखा है | वे जगदारादय राजकुमार अब अति शुद्ध महान ‘बुद्ध’ बन चुके है और इसी ओर आ रहे है | यह सुनते ही यशोधरा ने, इससे पहले कि उन्हें महाराजा अपने पास बुलावा पाते, दूतो के माध्यमसे उन्हें अपने महल में बुलवा लिया | पूछने पर ‘त्रपुत्र’ नामक व्यापारी बोला – “हे देवी ! हम उन्हें अपनी आँखों से देख कर आ रहे है | वे तो राजाओं के भी राजा बन चुके है | नगर- नगर, गाव -गाव जाकर वे जैसे –जैसे उपदेश देते है, लोग उनका अनुसरण कर सुख और शांति पाते है | हमने ‘गया” के निकट क्षिरिका – वन में उनके उपदेश सुने है | चौमासे के पहले ही वे यहा आ पहुचेंगे |” इसके बाद ‘भल्लिक’ ने सविस्तार वृतांत सुनाया और बताया कि अब उन्हें ‘बुद्ध’ नाम से सम्बोधित किया जाता है | वे लोगो को “अष्टांगमार्ग” और “द्वादश निदान” सुझाते है | ज्ञानप्राप्ति पर उन्हें पंचवर्गीय भिक्षुओं का ध्यान आया और वे तुरंत वाराणसी की और चल पड़े | वहां उन्होंने धर्म चक्र का ज्ञान दिया, साथ में “मध्यमा प्रतिपदा”, आर्यसत्य” और “अष्टांगमार्ग” में भी दीक्षित किया | इन पांच में से सर्वप्रथम “कौडिन्य” नमक शिष्य दीक्षित हुआ, बाद में “महानाम” , “भद्रक”, “वासन” और “अश्वजित” दीक्षित हुए |

फिर वाराणसी का “यश” नामक नगर सेठ प्रव्रज्या का अधिकारी बना | यही से बुद्ध ने साठ भिक्षुओं को प्रचार हेतु भेजा | फिर राजगृह के निकट “यष्टिवन” पहुचे जहा महाराज बिंबसार ने परिजनों सहित उनकी शरण ग्रहण की | इतना कह, यशोधरा से विदा ले दोनों व्यापारी चल दिए | यह समाचार सुने तो महाराजा ने तथागत को लिवा लाने के लिए नौ सामंतो को भेजा | वे वेणुवन पहुचे पर तथागत के उपदेश सुन सबकुछ भूल गए और उनके धर्म संघ में शामिल हो गए | तब उन्होंने अपने सचिव के सूत व सिद्धार्थ के बाल सखा को भेजा | वह भी उनके सम्मुख जाते ही भिक्षु बन गए | पर अवसर देख कपिलवस्तु चलने की प्रार्थना की इ बुद्ध कपिलवस्तु पहुचे और निकट जाते ही यशोधरा अधीर हो उनके चरणों पर गिर पड़ी | उन्होंने वहीं यशोधरा को दीक्षा दे स्थिर –चित्त किया | बाद में एक भिक्षु ने शंकालु हो प्रश्न किया कि आपने यशोधरा को अपना आलिंगन क्यों करने दिया | शास्ता ने उत्तर देते हुए समझाया कि महा प्रेम लघु प्रेम को इसी भांति सहारा देता है |

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