किसके चित्त में राग नहीं घुसता है ?

किसके चित्त में राग नहीं घुसता है ?

नन्द स्थविर की कथा

उधर भूप ने जब सुना कि राजकुमार पुर के द्वार तक आ पहुचे है और भिक्षार्थ नीचों के आगे हाथ फैला रहे है तो नृप स्वेत मूंछो को एठते, दांत पीसते, तुरंग पर सवार हो, रोष सहित महल से निकले | पर बुद्ध के सम्मुख पहुचते ही क्रोध लुप्त हो गया; तथापि इतना कहा कि, “पुत्र! यह राजपाट, वैभव आदि सब तुम्हारा है | तुम्हे यहाँ इसी गौरव गरिमा के साथ आना चाहिए था | “शाक्य मुनि ने उत्तर दिया – “ हे तात ! मर्त्यो की कोई कुल परंपरा होती ही नहीं, कुल परंपरा तो ‘बुद्ध – अवतारों की होती है |”

तत्पश्चात शास्ता ने महाराज को मोक्ष के आठ सोपान समझाये | इस प्रकार उस रात राज-कुल ने शांति मार्ग पर चलने हेतु मंगलमय प्रवेश किया | राजा शुधोद्न स्त्रोतापतिफल में प्रतिष्ठित हो गए | बुद्ध की मौसी मा महापजापति गौतमी ने भी स्त्रोतापतिफल प्राप्त क्र लिया | शाक्य मुनि ने राहुल की माता के सद्गुणों का जिक्र कर चन्दकित्रनी जातक सुनाया |

तीसरे दिन तथागत के छोटे भाई नन्द का विवाह था |

भोजनोपरांत चलने के समय नन्द ने तथागत का भिक्षा पात्र उठाया | बुद्ध ने नन्द के हाथ से अपना पात्र वापस नहीं लिया | वे अपने आसन से उठे और विहार की ओर चल दिए | सिस्ठाचारवश नन्द उनका पात्र लिए पीछे-पीछे चलता गया | शाक्य मुनि चलते गए, रुके नहीं | उधर होने वाली पत्नी, जनपदकल्याणी भी नन्द के पीछे-पीछे दौड़ती गई और बोलती गई , “आर्यपुत्र ! जल्द लौट आइयेगा |” विहार पहुचने पर तथागत ने नन्द से प्रश्न किया, “नन्द,प्रव्रजित होवोगे ?” नन्द ‘ना” नहीं कह सका और प्रव्रजित हो गया |

इधर माँ के कहने से राहुल भी शास्ता के पास गया और अपना हक मांगने लगा | तब शास्ता ने राहुल को भी प्रव्रजित कर दिया | राजा शुधोद्न को जब पता चला तो उन्हें बहुत दु:ख हुआ | उन्होंने तथागत से आग्रह किया कि भविष्य में माता-पिता की अनुमति के बिना बच्चो को प्रव्रजित नहीं किया जाए | शास्ता ने राजा को यह आश्वासन दिया और विनय का नियम बदल दिया |

उधर प्रव्रजित होने पर नन्द को जनपदकल्याणी के शब्द बार-बार याद आ रहे थे | उसका मन साधना में नहीं लग रहा था | उसने बुद्ध से चीवर छोड़ने का आग्रह किया | तथागत ने उससे कहा कि अगर वह तन्मयता से साधना करेगा तो वे जनपदकल्याणी से भी सुंदर स्त्री दिला देंगे | नन्द ने स्वीकृति दे दी और साधना करते-करते नन्द अह्र्त्व प्राप्त क्र गया | अब उसे किसी स्त्री में कोई रूचि नही रह गई थी | नन्द के अह्र्त्व प्राप्त करने से अब शाक्य-मुनि भी वचनबद्ध नही रह गए थे |

तब शाक्य-मुनि ने ये दो गाथाये सुनाई |

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