किसे सार प्राप्त नहीं होता ?

 किसे सार प्राप्त नहीं होता ?

स्थविर सारिपुत्र की कथा

शाक्य-मुनि के पृथ्वी पर पदार्पण के पहले से ही राजगृह के पास उपतिष्य तथा कोलित नाम के दो गाव थे | जिस दिन उपतिष्य गाव की | ‘सारी’ नामक ब्राह्मणी ने गर्भधारण किया, उसी दिन कोलित गाव की ‘मोग्गली’ नाम की ब्राह्मणी ने गर्भधारण किया | यह संयोग की बात थी कि दोनों ब्राह्मणी ने एक ही दिन गर्भधारण किया | इन दोनों परिवार में सात पीढीयों से गाढ़ी मित्रता थी | समय आने पर दोनों परिवार में पुत्र पैदा हुए | सारी ब्राह्मणी के पुत्र का नाम उपतिष्य रखा गया और मोग्गली के पुत्र का नाम कोलित रखा गया | उम्र आते ही वे दोनों सर्वगुणसंपन्न हो गए |

उन दिनों राजगृह में प्रत्येक वर्ष ‘गिरिजसमज्ज’ नामक मेला लगता था | दोनों मित्र एक ही मंच पर बैठकर मेला देखते | हँसनेकी बात बर हँसते थे, उदासी की बात पर उदास होते थे तथा दान देने के अवसर पर उचित दान देते थे | इस प्रकार एक बार, अपने प्रारंभ के अनुसार, वे हसने की बात पर भी चुप रहे, रोने की बात पर भो मौन रहे तथा दान का अवसर आने पर भी कुछ नहीं किया | वे दोनों चुपचाप कुछ इस प्रकार सोचते रहे, “इस मेले में क्या रखा है ? सौ साल के अन्तराल में सब कुछ ही ख़त्म हो जायेंगा | हमे तो इस संसार रूपी मेले में क्या रखा है ? समय के अन्तराल में सब कुछ नष्ट हो जायेंगा | अत: मै सोच रहा हु कि इससे मुक्ति कैसे मिले | परंतु मित्र ! आज तो तुम भी उदास बैठे हुए हो | तुम्हारी उदासी का क्या कारण है ? “ कोलित ने कहा, “बंधू ! मै भी वहीं सोच रहा हु जो तुम सोच रहे हो | हम दोनों की ही सोच ठीक है | पर मुक्ति के लिए तो प्रव्रज्या लेनी होगी | किससे प्रव्रज्या ली जाए ?”

उन दिनों राजगृह में संजय नाम का एक परिव्राजक अपने शिष्यों के विशाल समूह के साथ रहता था | उपतिषय तथा कोलित ने उसी से प्रव्रज्या लेने का विचार किया | वे उसके पास गए, उससे प्रव्रज्या ग्रहण की और बहुत जल्द ही संजय द्वारा बताये सारे सिधान्तों को पूरी तरह ह्दयगम कर गए | तब उन्होंने संजय से पूछा, “आचार्य ! हमने आपके द्वरा बताये सारे सिधान्तों को ह्दयगम क्र लिया | अब आगे कुछ बताईए |” “आगे बताने के लिए कुछ नहीं है | जितना मालूम था, उतना बता दिया |” यह सुनकर दोनों मित्रो ने राय की, “इस आचार्य के पास रहने से कोई फायदा नहीं है | आर्यावर्त बहुत विशाल देश है | अगर हम यहाँ घूमेंगे तो निश्चय ही कोई न कोई सही आचार्य मिल जाएगा |” ऐसा सोचकर दोनों मित्र पुरे जम्बूद्वीप घुमते रहे | उन्हें एक के बाद एक आचार्य मिलते गए पर जब उन आचार्यो से शंका समाधान के लिए प्रश्न करते तो वे उत्तर नहीं दे पाते थे | कुछ समय के बाद उन दोनों ने अनुभव किया कि अब और भटकना बेकार है | अत: हार-थककर वे राजगृह वापस आ गए और परस्पर निर्णय लिया, “हममे से जिसको भी सत्य की पहले अनुभूति होंगी, वह दसरे को तुरंत सूचित करेगा |”

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