किसे सार प्राप्त होता है ?

किसे सार प्राप्त होता है ?

 स्थविर सारिपुत्र की कथा

इस प्रकार विचार कर दोनों अपनी-अपनी साधना में लग गए | उसी समय शाक्य मुनि राजगुह पधारे | वे वेणुवन में रह रहे थे | उनके साथ पंचवर्गीय भिक्षुओ में से अश्वजित नाम का भी भिक्षु आया | उसने किसी दिन भिक्षाटन के लिए नगर में प्रवेश किया | उसी समय उपतिस्य भी भिक्षाचर्या हेतु निकल पड़ा | रास्ते में उपतिस्य ने अश्वजित को देखकर मन ही मन सोचा, “मैंने आज तक ऐसा तेजस्वी परिवाज्रक नहीं देखा है | क्यों न मै इससे बाते करू तथा इसके आचार्य आदि के बारे में पुछु ? “अत: सही अवसर पाकर उपतिस्य अश्वजित के पास गया तथा उनसे उनके बारे में पुछा | अश्वजित स्थविर ने “जो धर्म हेतु उत्पन्न है” गाथा सुनाई | दो पद सुनते ही उपतिस्य स्त्रोतापन हो गया | फिर आचार्य ने शाक्य मुनि के विषय में बताया जो उस समय राजगृह के वेणुवन में वास कर रहे थे | उपतिस्य ने अश्वजित से आज्ञा ली और कोलित के पास गया तथा उसे भी स्थविर द्वरा सुनाई गई गाथा सुनाई | उसे सुनते ही वह भी स्त्रोतापन हो गया | तब दोनों मित्रों ने शाक्य मुनि के पास जाकर उनसे आशीर्वाद लेने का विचार किया | सोचा “अपने आचार्य संजय को भी साथ ले चलते है |” ऐसा सोचकर दोनों शिष्य संजय के पास गये तथा उससे शाक्य मुनि के पास चलने के लिए आग्रह किया | पर संजय इसके लिए तैयार नहीं हुआ | जब शिष्यों ने इसका कारण पूछा तो संजय ने उत्तर दिया, “मैंने उच्च कुल के महाजनों का गुरु बनकर अभी तक जीवन यापन किया है | अब मेरे लिए किसी का शिष्य बनना असंभव है |” दोनों शिष्यों ने समझाने की पूरी कोशिश की पर संजय तैयार नहीं हुआ तथा उनसे कहा, “संसार में बुद्धिमान की तुलना में मुर्ख अधिक है | अत: बुद्धिमान अगर शाक्य मुनि के पास जायेंगे तो मुर्ख तो मुर्ख मेरे ही पास आयेंगे | “ ऐसा सुन उपतिस्य और कोलित दोनों शास्ता से मिलने चल पड़े | संजय के अधिकांश शिष्य भी उन दोनों के पीछे ही लिए | संजय यह आघात बर्दाश नहीं कर पाया और वहीं तुरंत उसकी मृत्यु हो गयी | उधर उपतिस्य और कोलित शास्ता के पास पहुचे और उनसे प्रव्रज्या की पार्थना की | शास्ता ने दोनों को प्रव्रज्या दी | उन्होंने बुद्ध को बताया कि किस प्रकार उन्होंने बहुत कोशिश की कि संजय त्रिरत्न की शरण में आये पर वह तैयार नहीं हुआ | कुछ दिनों बाद कोलित (महामोग्लान के रूप में) तथा उसके बाद उपतिस्य (सारिपुत्र के रूप में) अहर्त हो गयें |

शाक्य मुनि ने समझाया, “अपनी गलत दृष्टि के कारण संजय एक मुर्ख की तरह असार को सार और सार को असार समझ बैठा था | इसके विपरीत मोग्लान तथा सारिपुत्र समझदार थे और उन्होंने असार को असार तथा सार को सार समझ लिया था |”

तब शास्ता ने ये दो गाथाये सुनाई |

आगे चलकर महामोग्लान तथा सारिपुत्र दोनों ही तथागत के प्रधान तथा श्रेष्ठ शिष्य बन गये |

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