जो कमजोर (वृक्ष) है : मार (तूफान) उसे उखाड़ फेकेंगा

जो कमजोर (वृक्ष) है : मार (तूफान) उसे उखाड़ फेकेंगा

महाकाल – चूल्लकाल की कथा

बुद्धकाल की बात है | सेतव्य नगर में महाकाल, मध्यकाल तथा चूल्लकाल नामक तिन भाई व्यापार कर जीविका चलाते थे | बड़ा भाई महाकाल तथा छोटा भाई चूल्लकाल भिन्न भिन्न जगह व्यापार हेतु जाते तथा गाडियों में सामान लादकर लाते | मंझला भाई मध्यकाल उन वस्तुओं की बिक्री करता |

एक बार दोनों भाई गाड़ियो में ख़रीदा हुआ सामान लेकर गाव लौट रहे थे | रास्ते में उन्होंने श्रावस्ती एवं जेतवन के बिच अपना काफिला रोक दिया | वहा महाकाल ने कुछ उपासको को बुद्ध का उपदेश सुनने जाते हुए देखा | उत्सुकतावश अपने भाई को बैलगाड़ीयो कि निगरानी का जिम्मा देकर स्वयं शास्ता की धर्मसभा में जाकर, उन्हें प्रमाण कर धर्म कथा सुनने लगा | शास्ता ने उस दिन दु:खस्कन्धसूत्र पर प्रवचन दिया | यह सुनकर महाकाल को शरीर की नश्वरता का भान हो गया | उसने तुरंत प्रव्रज्या लेने का मन बना लिया | शास्ता के पास प्रव्रज्या की प्राथना लेकर गया | बुद्ध ने पूछा, “ प्रव्रज्या की अनुमति देने वाला कोई है ? “ तब महाकाल ने अपने छोटे भाई चूल्लकाल को बुलाया | छोटे भाई ने समझाने की बहुत कोशिश की कि वह प्रव्रज्या धारण न करे पर महाकाल नहीं माना | वह प्रव्रजित हो गया | छोटे भाई ने भी प्रव्रज्या ले ली |

महाकाल श्मशान साधना करते-करते अह्र्त्व तक पहुच गया | इसके विपरीत छोटे भाई चूल्लकाल का मन साधना में नहीं लगता था | वास्तव में वह विहार में यह सोचकर रह रहा था कि एक न एक दिन अपने भाई को पुन:गृहस्थ आश्रम में वापस खीच लाएगा |

महाकाल के अह्र्त्व प्राप्ति के बाद एक दिन शास्ता भिक्षुगण के साथ चारिका करते हुए सेतव्य में सिन्सपावन पधारे | चूल्लकाल की पत्नियों ने जब सुना कि शास्ता भिक्षुगण के साथ सेतव्य पधारे है तो उन्होंने चूल्लकाल को पुन:गृहस्थ बनाने के लिए एक योजना बनाई |

शास्ता और भिक्षुगण को भोजन दान के लिए आमंत्रित किया गया | ‘व्यवस्था ठीक है या नहीं ‘ यह देखने के लिए चूल्लकाल को पहले भेजा गया | लेकिन चूल्लकाल के वहा पहुचने पर उसकी पत्नियाँ उसे तरह-तरह के ताने देने लगी, मजाक करने लगी तथा वस्त्र खीचने लगी | उन्होंने चूल्लकाल का चीवर उतर दिया और उसकी जगह सफ़ेद वस्त्र पहनाकर विहार भेज दिया | चूल्लकाल को प्रव्रजित हुए अभी एक वर्ष भी नहीं हुआ था | उसे बुद्ध, धर्म एवं संघ में कोई विशेष श्रधा नहीं थी | अत: उसे चीवर छोड़ने में कोइ संकोच नहीं हुआ |

Scan10013

Leave a Comment