मन से बडा कुछ नही

चक्षुपाल की कथा

Scan10001

यह गाथा बुद्ध ने श्रावस्ती के तेजवन विहार में चक्षुपाल नामक एक नेत्रहीन भिक्षु के संदर्भ में कही थी |

एक दिन भिक्षु चक्षुपाल जेतवन विहार में बुद्ध को श्रद्धा सुमन अर्पित करने आया | रात्री में वह ध्यान साधना में लीन टहलता रहा | उसके पैरो के नीचे कई किडे – मकोडे दबकर मर गये | सुबह में कुछ अन्य भिक्षुगन वहा आये और उन्होने उन किडे – मकोडो को मरा हुआ पाया | उन्होने बुद्ध को सूचित किया कि किस प्रकार चक्षुपाल ने रात्रीबेला में पाप कर्म किया था | बुद्ध ने उन भिक्षुओ से पुछा कि क्या उन्होने चक्षुपाल को उन किडो को मारते हुए देखा था | जब उन्होने नकारात्मक उत्तर दिया तब बुद्ध ने उनसे कहा कि जैसे उन्होने चक्षुपाल को उन किडो को मारते हुए नही देखा था वैसे ही चक्षुपाल ने भी उन जीवित किडो को नही देखा था | “ इसके अतिरिक्त चक्षुपाल ने अह्र्त्व प्राप्त कर लिया है | अतः उसके मन में हिंसा का भाव नही हो सकता था | इस प्रकार वह निर्दोष है |” भिक्षुओ द्वारा पुछे जाने पर कि अह्र्थ होने के बावजुद चक्षुपाल अंधा क्यो था, बुद्धने यह कथा सुनाई :

अपने एक पूर्व जन्म में चक्षुपाल आंखो का चिकित्सक था | एक बार उसने जान बुझकर एक महिला रोगी को अंधा कर दिया था | उस महिला ने वचन दिया था कि अगर उसकी आंखे ठीक हो जायेगी तो वह अपने बच्चो के साथ उसकी दासी हो जायेगी और जीवन पर्यंत उसकी गुलामी करेगी | उसकी आखो का इलाज चलता रहा और आंखे पूर्णतः ठीक भी हो गई | पर इस भय से कि उसे जीवन पर्यंत गुलामी करनी होंगी, उसने चिकित्सक से झुठ बोल दिया कि उसकी आंखे ठीक नही हो रही थी | चिकित्सक को मालूम था कि वह झुठ बोल रही थी | अतः उसने एक ऐसी दवा दे दी जिससे उस स्त्री की आंखो की रोशनी चली गई और वह पूर्णतः अंधी हो गई | अपने इस कुकर्म के कारण चक्षुपाल कई जन्मो में एक अन्धे व्यक्ती के रूप में पैदा हुआ था |

टिप्पणी : हमारे सभी अनुभवो का सूर्जन विचार से होता है | अगर बुरे विचारो से बोलते है या कोई कार्य करते है तो उनसे काष्ठदायक परिणाम प्राप्त होता है | हम जहा कही जाते है बुरे विचारो के कारण बुरे परिणाम ही पाते है | हम अपने दुःखो से तब तक मुक्त नही हो सकते जब तक हम अपने विचारो से ग्रस्त है |

गाथा : मनोपुब्बंगमा धम्मा, मनोसेत्ठा मनोमया |

      मनसा चे पदुठेन, भासती वा करोति वा |

      ततो नं दुक्खमन्वेति, चक्कं व वहतो पंद || १ ||

 

अर्थ :  मन सभी प्रवृतियो का प्रधान है | सभी धर्म ( अच्छा या बुरा) मन से ही

उत्पन होते है | यदी कोई दुषित मन से कोई कर्म करता है तो उसका

परिणाम दुःख होता है | दुःख उसका अनुकरण उसी प्रकार करता है

जिस प्रकार बैलगाडी का पाहिया बैल के खुर के निशान का पिछा

करता है |

man se bada01

 

Leave a Comment