मन ही सर्वेसर्वा है

मन ही सर्वेसर्वा है

मट्ठकुण्डली की कथा

मट्ठकुण्डली ब्राह्मण आदींपुमब्बक का पुत्र था | पिता बहुत ही कृपन था और कभी भी दान-पुण्य नहीं करता था | यहाँ तक कि जब उसे अपने पुत्र के लिए आभूषण बनाने की आवश्यकता पड़ी तो उसने उन आभूषणों को भी स्वयं ही बनाया ताकि स्वर्णकार को आभूषण बनानेकी मजदूरी न देनी पड़े | जब उसका पुत्र बीमार पड़ा तब पैसे बचने के लिए उसने चिकित्सक को भी इलाज के लिए नहीं बुलाया | लड़के की तबियत बिगडती गई | अंत में पिता को लगा कि अब असका ठीक होना संभव नहीं है | फिर भी चिकित्सक को बुलाने के बजाय, अदीनपुब्बक ने अपने पुत्र को घर के बहार खाट पर लिटा दिया ताकि लोग घर के अंदर न आ सकें और असके धन-दौलत को न देख सकें |

उस दिन प्रात: बुद्ध ने अपनी अन्तदृष्टि से सर्वेषण कि और अपने सर्वेषण में मट्ठकुण्डली को पाया | उन्होंने देखा कि मट्ठकुण्डली के आध्यात्मिक कल्याण का समय आ गया था | अत: उनके चरण मट्ठकुण्डली के आवास की और चल पड़े | घर-घर भिक्षाटन करते हुए शास्ता अदीनपुब्बक के घर के सामने पहुच गए |

मट्ठकुण्डली बरामदे में लेटा हुआ था | तथागत की दिव्य आभा से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका | भीतर से उसका हृदय शास्ता के दर्शन के लिए बेचैन हो रहा था पर उसका शरीर जवाब दे रहा था | उसकी काया खाट पर थी वह बुद्ध के साथ जुड़ चूका था |

अंतिम समय आ गया | मट्ठकुण्डली ने आँखे मूंद ली | मरते समय उसका हृदय बुद्ध के प्रति श्रध्दा से भरा हुआ था | इतना काफी था | उसका जन्म तवतिस दिव्य लोक में हुआ |

तवतिस दिव्य लोक से मट्ठकुण्डली ने देखा कि उसका पिता उसकी मृत्यु पर विह्वल होकर रो रहा है | अत: वह अपने पुराने रूप में पिता के सामने प्रकट हुआ | उसने पिता को अपने पुनर्जन्म के बारे में बताया तथा आग्रह किया कि वह बुद्ध को भोजन के लिए आमंत्रित करे | बुद्ध भोजन के आमंत्रित हुए | भोजन के बाद अदीनपुब्बक के परिवार वालो ने बुद्ध से प्रश्न किया, ”क्या कोई व्यक्ति बिना दान दिए, उपवास किए, कर्मकांड किए, मात्र बुद्ध में पूर्ण समर्पण से तवतिस दिव्य लोक में जन्म ले सकता है?” प्रत्युत्तर में बुद्ध ने मट्ठकुण्डली को उपासकों के सम्मुख प्रकट होने के लिए कहा | आदेश पाकर मट्ठकुण्डली दिव्य आभूषणों के साथ आम जनता के सामने प्रकट हुआ तथा स्पष्ट किया कि उसका जन्म तवतिस दिव्य लोक में हुआ है | उसे देखकर सबों को विश्वास करना पड़ा कि बुद्ध के प्रति पूर्ण समर्पण मात्र से मट्ठकुण्डली को इतना अधिक लाभ हुआ था |

टिप्पणी : मनुष्य के जीवन में जो कुछ भी घटित होता है वह विचारो का ही परिणाम है | अगर विचार पवित्र हों तो वाणी और कर्म भी पवित्र होंगे | पवित्र विचार, वाणी और कर्म से जीवन में सुख प्राप्त होंगा |

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