उम्र से कोई बड़ा नहीं होता, ज्ञान से बड़ा होता है

सुमना की कथा

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अनाथपिंडीक शास्ता के समर्पित शिष्यों में एक था | उसे ‘अनाथो के नाथ’ के रूप में जाना जाता है | उसने जेतवन में शास्ता के लिए एक बहुत बड़ी धनराशी खर्च कर विहार बनवाया था |

उसकी एक पुत्री थी | उसका नाम सुमना था | वह पिता के धर्मं के काम में हाथ बटाया करती थी | अनाथपिंडीक अपनी बेटी से बहुत खुश था | पर समय पर किसका वश चलता है ? एक बार सुमना बीमार पड़ी और फिर बिस्तर से उठ नहीं सकी | दुनिया से ही चल बसी | चलने से पूर्व उसने पिता को “भाई” कहकर संबोधित किया |

अनाथपिंडीक पुत्री के देहावसान पर बहुत दु:खी था और उससे भी अधिक भी दु:खी था यह सोचकर कि मरने से पहले उसकी बेटी ने उसे “भाई” कहकर पुकारा था | उसका मन विक्षिप्त था | उसे लग रहा था कि मरने से पहले उसकी बेटी ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया था | कुछ समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा कैसे हो गया |

बोझिल मन से वह शाक्य-मुनि के पास पहुचा तथा उन्हें प्रणाम कर बैठ गया | शास्ता ने उसके चेहरे का हाव-भाव देखकर उससे पूछा कि वह इतना परेशान क्यों दिख रहा है | तब अनाथपिंडीक ने अपनी पेरशानी का कारन बताया | उसकी समस्या सुनकर बुद्धा ने उसे समझाया , ‘’ अनाथपिंडीक ! तुम्हे चिंता करने की बात नहीं है | तुम्हारी पुत्री ने अपना मानसिक संतुलन नहीं खोया था | तुम स्त्रोतपत्र हो और वह सुकृदागामी थी | इस प्रकार आध्यात्मिक सीढी पर वह तुमसे एक कदम आगे थी | इस नाते अगर उसने तुम्हे भाई कहकर संबोधित किया तो तम्हे इसका बुरा नहीं मानना चाहिए |’’

तब उन्होंने यह गाथा कही |

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