जो चट्टान की तरह है, मार जैसा तूफान उसका क्या बिगड़ेगा ?

जो चट्टान की तरह है, मार जैसा तूफान उसका क्या बिगड़ेगा ?

महाकाल – चूल्लकाल की कथा

बुद्ध भिक्षु संघ के साथ आए | भोजन-दान हुआ | अनुमोदन हुआ | शास्ता संघ के साथ चले गए |

महाकाल की पत्नीयो ने भी सोचा कि महाकाल को भी गृहस्थ बना लिया जाए | अत: शास्ता तथा भिक्षुसंघ को भोजन दान के लिए बार फिर अगले दिन निमंत्रित किया गया | पर उस दिन पूर्व व्यवस्था देखने के लिए महाकाल को न भेजकर किसी अन्य भिक्षु को भेजा गया | उस भिक्षु ने वहा जाकर व्यवस्था देखने ली | महाकाल कि पत्नियाँ वह सब कुछ नहीं क्र पाई जिसे चूल्लकाल की पत्नियो ने किया था | चूल्लकाल की दो पत्नियाँ थी और महाकाल की आठ | महाकाल कि पत्नियों ने भोजन दान के उपरान्त शाक्य-मुनि से आग्रह किया कि महाकाल को भक्तानुमोदन के लिए छोड़ दे | शास्ता ने इसकी स्वीकृति दे दी और भिक्षुसंघ के साथ स्वयं विहार के लिए निकल पड़े | गाव से बाहर आते ही भिक्षुओ ने बुद्ध से प्रश्न किया “ आपने जानबुझकर महाकाल को छोड़ दिया या अनजाने में ही वह छुट गया ?“ चूल्लकाल का अनुभव उनके मन को कचोट रहा था | उन्होंने कहा, “भंते ! महाकाल एक सीधे स्वभाव वाला, शीलवान भिक्षु है | संभव है उसके परिवार वाले उसे पुन:गृहथ बना दे | चूल्लकाल की तो सिर्फ दो पत्नियाँ है, महाकाल कि तो आठ | “ शाक्य-मुनि ने रूककर भिक्षुओ को समझाया, “तुम चूल्लकाल और महाकाल को एक जैसा मानकर गलती क्र रहे हो | चूल्लकाल और महाकाल दोनों एक जैसे नहीं है | चूल्लकाल तो विहार में रहता हुआ भी सदैव गृहस्थ जीवन का ही चिंतन किया करता था | वह इस प्रकार व्यवहार करता था जैसे वह नदी के किनारे का एक दुर्लभ वृक्ष हो, जो जरा सी हवा के झोंके से उखड़ कर गिर सकता है | दूसरी और महाकाल प्रव्रज्या लेने के बाद गृहस्थ जीनव को एक बाधा के रूप में देखता रहा है | वह तो एक चट्टान की तरह है जस पर किसी भी तूफान का कोई असर नहीं पड़ता |

उधर महाकाल की पत्नियाँ भी चूल्लकाल की पत्नियों की तरह पति के चीवर बदलने की कोशिश करने लगी | महाकाल ने तुरंत परिस्थिति की गंभीरता को भांप लिया | वे अपने ॠधीबल से घर की छत तोड़कर बाहर निकल गए और गाव के बाहर वहा पहुचे जहा भिक्षुगण शाक्य-मुनि से उनके विषय में चर्चा कर रहे थे |

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