देवदत्त, तुम्हारे ऊपर यह काषाय नहीं शोभता

देवदत्त, तुम्हारे ऊपर यह काषाय नहीं शोभता

देवदत्त की कथा

आम जनता ने देवदत्त को वह वस्त्र धारण किए देखा I वे अपने आपको रोक नहीं सके और आपस में कहने लगे, “ यह वस्त्र देवदत्त के उपर शोभा नहीं देता I इसके सही पात्र तो भंते सारिपुत्र लगते है I”

बुद्ध उन दिनों श्रावस्ती में विराजमान थे I कुछ समय बाद एक भिक्षु राजगृह से श्रावस्ती पहुंचा और शाक्य मुनि के सम्मुख पहुच, उन्हें सादर प्रणाम कर एक किनारे बैठ गया I शास्ता ने उससे कुशल-मंगल पूछा I बातचीत के क्रम में उसने राजगृह की घटना बताई कि किस प्रकार देवदत्त नूतन वस्त्र धारण कर विचरण कर रहा था और लोगों में इस बारे में आक्रोश था I इन बातोँ को सुनकर शाक्य मुनि ने कहा, “ भिक्षुगण ! एसी घटना पहली बार नहीं हुई है कि सही पात्र न होने पर भी देवदत्त ने ऐसे कीमती कपड़े पहने है I पूर्व जन्म में भी वः एसा कर चुका है I” एसा कहकर शाक्य-मुनि ने भूतकाल की कथा सुनाई I

पूर्वकाल में जब वाराणसी में राजा ब्रम्हदत्त राज करते थे तब एक गजघातक हाथियों को मारकर, उसने प्राप्त दांत, नख, आंत, मास आदि बेचकर जीवन-यापन करता था I उन दिनों पच्येक बुद्ध जंगल में साधना करते थे I जंगल में विचरण करते समय हाथी जब भी पच्येक बुद्ध को देखते तो वे उन्हें झुककर प्रणाम कर आगे बढ़ते थे I एक दिन गजघातक ने यह देखा तो सोचा, “इन हाथियों को मारना बड़ा ही आसान है I अगर मुझे भी कही से काषाय वस्त्र मिल जाये तो उसे पहनकर मैं इन हाथियों को आसानी से मार सकूँगा I” एसा विचार कर वह काषाय वस्त्र कि खोज में लग गया I एक दिन उसने किसी भिक्षु को वस्त्र उतार, तालाब में स्नान करते हुए देखा I उसने भिक्षु का वस्त्र चुरा लिया I वह उसे ओढ कर बैठने लगा I हाथी जब प्रणाम कर आगे बढ़ते तो वह अंतिम हाथी को भाला मारकर उसकी हत्या कर दिया करता था I उसका दांत आदि निकालकर बेच देता था तथा बचा-खुचा अंश धरती में गाड़ देता था I

आगे चलकर एक बोधिसत्व हाथियों के राजा बने I वह बोधिसत्व हाथी भी, अपने पूर्वजो की आदत के अनुसार, गजघातक को प्रणाम कर आगे बढ़ता था I एक दिन हस्तीराज ने अपने साथियों से विचार किया, “ लगता है, हमारी संख्या प्रतिदिन घटती जा रही है I अगर कोई हाथी यहाँ से कही जाता तो बिना बताये नहीं जाता I अवश्य ही कोई हमारे साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार कर रहा है I मुझे उस काषायधारी पर शक हो रहा है I” एक दिन सभी हाथियों से मंत्रणा कर गजराज ने हस्ती-समूह को आगे भेज दिया और स्वयं सबसे अंत में चला I

प्रतिदिन की तरह उस हत्यारे ने हाथियों के प्रमाण कर चले जाने पर, राजा-हाथी पर भला फेक दिया I हाथी सावधान था, वह मुड़ गया और भाले के वार से बच गया I उसने उस गजघातक को पकड़ लिया और उससे पूछा कि क्या उसने हाथियों कि हत्या की थी I हत्यारें ने अपनी गलती स्वीकार कर ली I तब हस्तीराज ने सोचा, “ अगर मैं इसकी हत्या कर देता हु तो हजारो बुद्ध, पच्येक बुद्ध और क्षीणास्त्रव भिक्षुओ को यह सोचकर लज्जा होंगी कि काषायधारी भी जीव हत्या करते है I “एसा सोचकर हाथी ने उस घातक के प्राण नहीं लिये और उससे यह कहा, “ संसार से विरक्त भिक्षुओ के वस्त्र पहनकर तुमने हत्या करके बहुत बड़ा पाप किया है I तुम उस काषाय वस्त्र के अधिकारी नहीं थे I जो व्यक्ति भीतर से निर्मल और पवित्र है वही काषाय वस्त्र का अधिकारी है I”

शाक्य मुनि ने कथा सुनाते हुए बताया, “उस जन्म में हाथियों की हत्या करने वाला देवदत्त था और हाथियों का राजा मै था I इस प्रकार अधिकारी न होते हुए भी देवदत्त ने भूतकाल में भी काषाय वस्त्र धारण किया था I “एसा कहकर शास्ता ने ये दो गाथाए सुनाई I

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