पापी सर्वत्र दु:ख ही पायेगा

पापी सर्वत्र दु:ख ही पायेगा

देवदत्त की कथा

यह कहानी श्रावस्ती के जेतवन विहार की है | देवदत्त तथागत का ममेरा भाई था | हालाकी वह उनके संघ में भिक्षु था पर वह भीतर ही भीतर उनसे जलता था और बदला लेना चाहता था | उसने तीन बार बुद्ध की हत्या करनी चाही पर वह सफल नहीं हो पाया | अंतत: उसने संघ में फुट अपने साथ पांच सौ नए भिक्षुओ को लिया और गयाशिर्ष पर्वत चला गया | सारिपुत्र तथा मोग्लान नए बुद्ध को इस बात की जानकारी दी |

कुछ समय बाद एक दिन सारिपुत्र और मोग्लान गयाशिर्ष पर्वत पहुचें | देवदत्त ने उन्हें देखा तो बहुत खुश हुआ | उसने भिक्षुओं से कहा, “देखो ! हमारा धर्म कितना महान है कि सारिपुत्र और मोग्लान भी आ रहे हैं |” आदर-सत्कार के देवदत्त भिक्षुओं को प्रवचन देने लगा | पर वह थका हुआ था, उसे नींद आने लगी | उसने सारिपुत्र से आग्रह किया कि वह प्रवचन जारी रहें और स्वयं वहीं लेट गया | उसे नींद आ गई | सारिपुत्र नए प्रवचन जारी रखा | धर्म के सही तत्वों को सुनकर भिक्षुओं की आंखें खुलनी लगीं | उनके विचार बदलने लगे और उन्होनें महसूस किया कि उन्हें सही ज्ञान शास्ता के पास ही मिल सकता है, देवदत्त के पास नहीं | वे उठे | सारिपुत्र तथा मोग्लान के साथ हो लिए तथा शाक्य-मुनि के यहाँ जाने के लिए प्रस्थान कर गए | देवदत्त का भिक्षु कोकालित देवदत्त को उठाने लगा, “देवदत्त ! उठो ! उठो !! भिक्षुगण तुम्हेँ छोड़कर जा रहे हैं |” पर उसकी नींद ण खुली, वह सोता रहा |

भिक्षुओं के चले जाने से देवदत्त को बहुत गहरा धक्का लगा | वह बुरीतरह बीमार पड़ गया | उसका मित्र राजा अजातशत्रु भी किसी प्रकार उसकी मदद नहीं कर सका | वह सबों से अलग-थलग पड़ गया |

देवदत्त अब बुढा हो चूका था | उसके अन्दर पश्चताप की अनुभूति होने लगी | उसका पुराना सम्बंध, उसका हदय कचोटने लगा | उसने सोचा कि स्नान कर, तैयार होकर शास्ता के पास चलू | वह तट पर पंहुचा | नदी में स्नान करने के लिए प्रवेश करने ही जा रहा था कि उसके प्राण निकल गए | मरने से पहले उसने दु:ख प्रकट किया, “शाक्य मुनि की शरण के अतिरिक्त और कोई शरण नही है |

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