श्रामन्य का अधिकारी कौन ?

दो मित्र भिक्षुओं की कथा

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श्रावस्थी में एक बार दो उपासक मित्र शास्ता के संघ में शामिल हो गए | उनमें से एक धर्मोपदेश ध्यान से सुनता था और इसके परिणाम स्वरूप अन्दर कामभोगो की चाह समाप्त हो गई | पाच वर्षो तक साधना करने के बाद, शास्ता से प्रार्थनाभाव से बोला “भंते ! मैंने वृद्धावस्था में प्रवज्या ग्रहण की है | अब मेरी स्मृति भी दुर्लभ है | अब मै ग्रंथो को कंठस्थ नहीं कर पाउँगा | हां, मै विपश्यना की साधना पूरी तन्मयता तथा लगन से करूँगा | “ऐसा सुनकर शाक्य-मुनि ने विपश्यना की कर्म विधि समझा दी | वह भिक्षु हृदय से साधना में लग गया | कुछ समय बाद तपस्या ने रंग दिखाया | वह अहतर्व प्राप्त कर गया |

दुसरे भिक्षु ने संकल्प किया, “मै ग्रंथो के माध्यम से अपने कर्तव्यों का पालन करूँगा | “ऐसा सोचकर वह बुद्ध वचनों को कंठस्थ करने लगा तथा जहां- तहां जाकर उन पर धर्म प्रवचन करने लगा | उसका स्वर सुन्दर था | अत: बुद्ध देशना / उपदेश प्रभावशाली था | इस प्रकार वह कई महासंघों का आचार्य बन गया |

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