श्रामन्य का अधिकारी

दो मित्र भिक्षुओं की कथा

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बुद्ध संघ में दो प्रकार के भिक्षु थे | एक वे जो शाक्य-मुनि के उपदेशो को सुनकर उन पर धारा प्रवाह प्रवचन इस प्रकार करते थे की नौसिखुआ भिक्षुओं के पल्ले कुछ भी नहीं पड़ता था | इस प्रकार वे अपनी विद्वता सिद्ध करते थे | पंडित भिक्षुओं को पंडिताई के अलावा कुछ भी प्राप्त नहीं हो पाता था |

दूसरी श्रेणी के भिक्षु संसार का त्याग कर धर्म और निर्वाण को प्राप्त करने के लिए सतत प्रयत्नशील रहा करते थे | वे धर्म के पथ पर स्वयं चलते थे और अपने अनुभव के आधार पर वे बहुत कुछ प्राप्त कर लिया करते थे | लेकिन जब कभी वाद-विवाद होता तो पंडित भिक्षुओं के वाग्जाल से वे बाहर नहीं निकल पाते थे | पंडित भिक्षुगण बाजी मार ले जाते थे |

शाक्य मुनि को इस बात की पूरी जानकारी थी | एक दिन उन्होंने धर्म-सभा में समझाया, “जो व्यक्ति ग्रंथो का पाठ याद कर लेता है पर उन पर आचरण नहीं करता वह वैसा ही है जैसा गाय चराने की नौकरी करने वाला व्यक्ति | उसका कम मात्र गाय चराना होता है तथा श्याम में गायें गिनना | वह श्रमण का अधिकारी नहीं होता है | दूसरी ओर अगर कोई थोड़े ही ग्रंथो का पाठ करे पर उसके अनुकूल आचरण करे तो वह वैसा ही होता है जैसे वह स्वयं गायों का मालिक हो | उसे दूध,दही,मक्खन, घी,छाछ,मलाई सभी की प्राप्ति होती है |”

 

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