अशुभ की स्मृति रखे, शुभ होता जायेंगा

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अशुभ की स्मृति रखे, शुभ होता जायेंगा

भद्दीयवासी भिक्षुओं की कथा

महाकारुणिक सांसारिक भिक्षुओं को सही मार्ग पर लाना चाहते थे | अत: उन भिक्षुओं को बुलाया और उन्हें समझाया, “भिक्षुओं ! तुम भूल गए हो कि किस भावना और किस उद्देश से प्रव्रजित हुए थे | आज तुम क्या कर रहें हो ? तुम अपने कर्तव्यो और अकर्तव्यो का स्मरण करो |” शास्त्रों में भिक्षुओं के पालन करने वाले कर्तव्य बताते है (१) अपरिमित शील स्कन्ध की रक्षा (२) अरण्यवास (३) ददृतांगव्रत का धारण एव (४) करुणा, मैत्री आदि कि भावना | इन्हें ‘भिक्षुकृत’ कहा जाता है | उनके लिए निषिद्ध कर्म है : अपने छाया जूता, खडाऊ, पात्र, थाली, जलपात्र, का्यबन्धन, असंबंध को सजाते, सवारते रहना | जो इन अकृत्य कर्मो को करते है, समाज में उनकी प्रतिष्ठा कम हो जाती है | लोग उन्हें अश्रध्दा की दृष्टी से देखने लगते है और उनके चारों ही आस्त्रव बहुत अधिक बढ़ जाते है |

शाक्य मुनि ने आगे समझाया, “सांसारिक कार्यो को अपने उत्तरदायित्व के रूप में लेकर तुमने अपने आस्त्रवो की बाढ़ का सुर्जन कर दिया है |अब तुम ऐसे कृत करो जिनसे इनका सुर्जन बंद हो जाए और जो पहले से बन चुके है उनका प्रभाव कम हो जाए और अंततः वे समाप्त हो जाये |”

फिर बुद्ध ने उन्हें ये गाथाए सुनाई | वे भिक्षु अंततः अह्र्त्व प्राप्त कर गए |

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