अहिंसास्मृति वाले शिष्य सदैव प्रबुद्ध रहते है

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अहिंसास्मृति वाले शिष्य सदैव प्रबुद्ध रहते है

दारूशाकटिक पुत्र की कथा

तब सम्यगदृष्टी प्रेत ने मिथ्यादृष्टी प्रेत को समझाया, “हमने उस लड़के के साथ ऐसा व्यवहार करके साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है | अब हमे इसका प्रायश्चित करना चाहिए |” ऐसा कहकर वे दोनों उसकी रक्षा में बैठ गए | मिथ्यादृष्टी ने सोचा, “बच्चे को भूख लगी होगी |” अत: राजमहल गया और राजा के सोने की थाली में बालक के लिए भोजन ले आया | उस बालक के सामने भोजन रख दिया | फिर दोनों प्रेतों ने उस बालक के माता-पिता का रूप धारण कर लिया और उसे खाना खिला, रात भर उसकी रक्षा करते रहें | उन्होंने थाली बैलगाड़ी में लकड़ी के अंदर छुपा दिया |

सुबह-सुबह राजमहल में हंगामा हो गया कि ‘राजा के रसोईघर से सोने की थाली चोरी हो गई है |’ सुरक्षा की दृष्टी से नगर के सभी द्वार बंद कर दिये गये और जब नगर के अंदर थाली नहीं मिली तो राज सिपाही थाली खोजते हुए नगर के बाहर निकले | खोजते-खोजते वे बैलगाड़ी तक पहुचे और वहा बैलगाड़ी से सोने की थाली बरामद कर ली | राज सिपाहियों ने सोचा कि इसी लड़के ने चोरी की है | अत: उसे पकड़कर राजा के पास ले गए | राजा ने लड़के से पूछा, “क्या बात है ?” बालक ने कहा, “मै कुछ नहीं जानता हू | सिर्फ यह जानता हु कि रात्रि बेला में मेरे माता-पिता मेरे पास आए, उन्होंने मुझे भोजन कराया और मेरे पास बैठे रहें | मै भी श सोचकर कि ‘मेरे माता पिता मेरे पास ही बैठे है तथा मेरी रक्षा कर रहें है’ , निश्चिंत होकर रात भर सोता रहा | मै सिर्फ इतना ही जानता हु | इसके अलावा और कुछ नहीं जानता |”

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