आत्मसंयमी साधक तो अकेला ही चलेंगा

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आत्मसंयमी साधक तो अकेला ही चलेंगा

अकेले विहार करने वाले थेर के कथा

शाक्य मुनि जेतवन ने विहरते थे | विहार में अनेक भिक्षु रहकर ध्यान-साधना का अभ्यास करते थे | वे आपस में मिलते-जुलते भी थे, धर्म-चर्या भी करते थे, लेकिन उनमे एक भिक्षु इनसे सर्वथा भिन्न था | वह दुसरे भिक्षुओं से मिलता-जुलता नहीं था | वह एकांत प्रेमी था | वह अपना आसन अकेला ही कही अलग लगता था | अकेला ही उठता-बैठता था | अकेला ही कही खड़ा होता था | अकेला ही चंक्रमण करता था | वह पूर्णत: एक विहारिक था |

दुसरे भिक्षुओं को यह बात कुछ अटपटी-सी लगी | बात पुरे विहार में फ़ैल गई | ‘एक विहारिक’ भिक्षु संघ में चर्चा का विषय बन गया | भिक्षुओं ने उसके अकेलेपन की चर्चा तथागत से की | शास्ता ने उसकी चर्या को अनुचित नहीं ठहराया, वरन उसे एकाकी होकर ठहराते हुए उसे साधुवाद दिया और कहा, “भिक्षु को इसी प्रकार एकांतवासी होना चाहिए | उसे एकाकी होकर विचरण करना चाहिए | एकांत के आनंद की अनुभूति लेनी चाहिए | भीड़-भाड के आनंद से बचना चाहिए और ‘अपने साथ’ रहना चाहिए | एकासन वाला, एकशय्या वाला, आलस्य रहित होकर एकांत प्रदेश में वास करना चाहिए |”

तब शाक्य मुनि से यह गाथा कही |

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