कर्म और अकर्म का भेद जानो

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कर्म और अकर्म का भेद जानो

भद्धियवासी भिक्षुओं की कथा

शाक्य मुनि का वास भद्धियनगर में चल रहा था | यह घटना उसी समय की है | वहा के भिक्षु अपनी ध्यान-विपश्यना के असली काम को छोड़कर सांसारिक काम-जूते बनाने में लग गए थे | कुछ ने अन्य काम शुरू कर दिया था- जैसे पात्रों को रंगकर सुंदर बनाने का काम, कपड़ो पर नाना प्रकार की कशीदाकारी आदि-आदि | वे विभिन्न तरह की सजी-सजाई अलंकृत पादुकाओ को या तो बनाते थे या दुसरो से बनवाते थे | पादुकाए एक से एक सुंदर होती थी- त्र्रून की भी, बब्बज घास की भी, खजूर के पत्तो की भी होती थी | वे कमल और कम्बल से बने चप्पल भी पहनते थे | इस कारण उनके पास ध्यान- विपश्यना से का समय ही नहीं बचाता था | या वस्तुतः यह कहे कि वे ध्यान- विपश्यना भूल गए थे ध्यान- विपश्यना से बहुत दूर चले गए थे तो अतिशयोक्ति न होगी |

उनके साथ कुछ शांत प्रकृति के भिक्षु भी रहते थे | वे सभी यह सब देखकर बहुत विचलित और दु:खी होते थे | जब उन्होंने देखा कि वस्तुस्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा है वे अपनी शिकायत लेकर बुद्ध की शरण में पहुँचे |

शाक्य मुनि की यह विशेषता रही कि उन्होंने सबों का कल्याण ही सोचा | सर एडविन आर्नाल्ड ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक “लाइट आफ एशिया” की प्रस्तावना में लिखा है, “भले ही बौद्ध साहित्यों में बुद्ध की शिक्षा के विषय में विद्वानों में मतभेद हो पर संपूर्ण विश्व के समस्त बौद्ध साहित्य में इस महान सुकुमार राजकुमार, जो अंततः बुद्ध हो गए, के चरित्र में कोई कमी, कमजोरी का वर्णन नहीं है | इस प्रकार संसार के इतिहास में वे एक मात्र ऐसे व्यक्ति है जो पूर्णत: निष्कलंक है |”

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