कायगतास्मृति वाले शिष्य सदैव प्रबुद्ध रहते है

19

कायगतास्मृति वाले शिष्य सदैव प्रबुद्ध रहते है

दारूशाकटिक पुत्र की कथा

उधर उसका बेटा बैलगाड़ी पर बैठा पिता की प्रतीक्षा कर रहा था | पिता नगर के अंदर बंद था और उसका बेटा उधर श्मशान में अकेला | बेटा गाड़ी के निचे छिपकर सो गया | राजगृह में बहुत सारे भुर-पिशाच रहते थे और बेचारा लड़का श्मशान में अकेला था | रात का अंधेरा छाते ही दो प्रेतों ने उसे देख लिया | उधर लड़के के मन में तरह तरह के विचार आने लगे | लेकिन वह शांत होकर बुद्धानुस्मृति ‘नमो बुद्धाय’, ‘नमो बुद्धाय’ का उच्चारण करने लगा | वह भयभीत नहि हुआ और शांतिपूर्वक वही लेट रहा | बौद्ध साहित्य में जिक्र आता है कि उसी समय दो प्रेत आए – एक बुद्ध शासन का विरोधी मिथ्यादृष्टी था और दूसरा सम्यगदृष्टी था जिसकी बुद्ध-शासन में प्रीति थी | उनमे से मिथ्यादृष्टी ने कहा, “यह खाने की वस्तु है | इसे खा जाना चाहिए |” सम्यगदृष्टी ने कहा, “नहीं, ऐसा करना उचित नहीं होंगा | तुम ऐसा मत करो |” पर मिथ्यादृष्टी नहीं माना, उसने उस बालक के पैर पकड़ लिए और पकडकर खीचने लगा | बालक को लग गया कि उसका पैर खीचा जा रहा है पर वह अपने स्वभाव के अनुसार ‘नमो बुद्धाय’ मंत्र का जप करने लगा | बौद्ध मंत्र सुनते ही मिथ्यादृष्टी वहा से दूर भाग खड़ा हुआ |

20

21

 

Leave a Comment