दुसरों को कष्ट देना : सबसे बड़ा पाप

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दुसरों को कष्ट देना : सबसे बड़ा पाप

मुर्गी के अंडे खाने वाले की कथा

श्रावस्ती नगर के निकट पण्डुर नामक एक गाव था | जहा एक महिला रहती थी | उसे मुर्गी के अंडे बहुत अच्छे लगते थे | उसने एक मुर्गी पाल रखी थी | मुर्गी जब भी अंडे देती, वह अंडे खा जाती | मुर्गी को बहुत क्रोध आता था पर वह कुछ कर नहीं सकती थी | अत: उसने बदला लेने का प्रण लिया |

कर्म का चक्र चलता है | अगले जन्म में वह औरत मुर्गी बनी और वह मुर्गी एक बिल्ली | अब इस जन्म में बिल्ली मुर्गी के अंडे खा जाती थी | कालचक्र फिर चला | अगले जन्म में मुर्गी तेंदुआ बनी और वह बिल्ली एक हिरणी | तेंदुए ने हिरणी व् उसके बच्चे को खा लिया | हिरणी ने अगले जन्म में बदला लेने की ठानी |

दोनों का अगला जन्म बुद्ध काल हुआ | वह हिरणी एक यक्षिणी बनी और तेंदुआ ने एक स्त्री के रूप में जन्म लिया | उस औरत को इस जन्म में एक पुत्र हुआ | एक दिन वह अपने पति के साथ मायके से वापस आ रही थी | रास्ते में तालाब के पास थोड़ी देर सुस्ताने के लिए रुकी | यक्षिणी ने मौका देखकर बालक को मार देना चाहा | माँ बच्चे को लेकर जेतवन की ओर भागी और बच्चे को बुद्ध के चरणों में रख दिया | बुद्ध ने यक्षिणी को भी बुलाया और दोनों को पूर्व जन्मों की कथा सुनाकर कि वैर से नहीं होता, वैर का अंत होता है : प्रेम, दया, करुणा और मैत्री से | इसका जिक्र “युग्मवर्ग” (गाथा नं. ५) में भी किया गया है |

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