नित्यभावनास्मृति वाले शिष्य सदैव प्रबुद्ध रहते है

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नित्यभावनास्मृति वाले शिष्य सदैव प्रबुद्ध रहते है

दारूशाकटिक पुत्र की कथा

जब यह वार्तालाप चल रहा था तो उसी समय लड़के के माता-पिता वहा आ गए | राजा को सच्चाई का पता चल गया | तब वह माता-पिता और पुत्र तीनों को लेकर शाक्य मुनि के सम्मुख उपस्थित हुआ | उसने शास्ता से जिज्ञासा जाहिर कि, “भन्ते ! क्या बुद्धानुस्मृतिमात्र से कष्ट और भयो से छुटकारा पाया जा सकता है या उसके साथ-साथ धर्मानुस्मृति भी आवश्यक है ? “तब शास्ता ने स्पष्ट किया, “केवल धर्मानुस्मृति मात्र ही रक्षक नहीं होती | बल्कि जिनका चित्त छ: प्रकार से अभ्यस्त है उन्हें किसी और रक्षा कवच या मंत्रोषधि की जरूरत नहीं पडती है |”

उन छ: प्रकारों का वर्णन करने के लिए तथागत ने छ: गाथाये कही |

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