निर्वाण लाभ, सर्वश्रेष्ठ लाभ

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निर्वाण लाभ, सर्वश्रेष्ठ लाभ

गंगारोहण की कथा

एक बार वैशाली में अभूतपूर्व अकाल पड़ा | वहा के नागरिक दाने-दाने को मोहताज हो गए | जो सबसे अधिक गरीब थे वे मौत की चपेट में पहले आ गए | उनके शव जहा-तहा पड़े रहें और उनमे आसक्त होकर भुत-प्रेत आ धमके | उन भुत-प्रेतों के आतंक से भी कई मर गए | महामारी भी फ़ैल गई | इस प्रकार वैशाली एक ही समय में तिन कष्टो से पीड़ित हो गया (१) अकाल का कष्ट (२) भुत-प्रेतों का कष्ट और (३) संक्रामक रोगों का कष्ट |

राजा और नागरिको ने आपस में मंत्रणा की कि बुद्ध वैशाली आने का आमंत्रण दिया जाये | उनके आने से सभी कुछ ठीक हो जायेंगा | शास्ता उन दिनों राजगृह में वर्षावास कर रहें थे | नागरिको ने महाली लिच्छवी और पुरोहितपुत्र को राजगृह भेजा कि वे किसी प्रकार शास्ता से प्रार्थना कर उन्हें वैशाली ले आवे | वे राजगृह गए और उन्होंने तथागत से वैशाली चलने का आग्रह किया | बुद्ध ने अपनी अंतदृष्टी से देखा कि अगर वहा ‘रतनसुत्त पाठ’ किया जाए तो वैशाली का कष्ट दूर किया जा सकता है | यह सोचकर शास्ता ने वैशाली चलने की स्वीकृति दे दी |

राजा बिंबिसार को पता चला कि शाक्य-मुनि भिक्षु संघ के साथ वैशाली जा रहें है तो उसने सडक मरम्मत करवा दी, रास्ते में विहार बनवा दिए और उन्हें पुरे स्वागत-सत्कार के साथ गंगा तट से विदा किया | उधर वैशाली वालो ने भी शास्ता के स्वागत में कोई कमी नहीं रखी | राजा स्वयं तथागत का स्वागत करने आया |

बुद्ध ने ज्यों ही वैशाली की भूमि पर चरण रखे, बड़े जोरो से वर्षा होने लगी | वर्षा के जल से शव बहकर गंगा में आ गए | इस प्रकार नगर पूर्णत: साफ हो गया | नगर के साफ हो जाने से सभी भुत-प्रेत भी भाग गए | तब शास्ता ने आनन्द को बुलाकर कहा, “तुम रात्रि के तीसरे प्रहर तक ‘रतनसुप्त’ का पाठ करते हुए विचरण करो |” स्थविर आनन्द ने वैसा ही किया और नगर त्रिकष्ट से मुक्त हो गया |

रास्ते में लौटते समय राजा बिंबिसार ने पुन: अव्दितीय आदर-सत्कार किया | शास्ता राजगृह चले आए | एक दिन संध्या में धर्म सभा में तथागत के अभुतपुर्वक आदर-सत्कार की बात चली |शास्ता ने अपनी पूर्व जन्म की बात बताते हुए कहा, “इस स्वागत में किसी का हाथ नहीं है | मैंने ही अपने पूर्व जन्म में एक सद्कर्म किया था | उसी परिणाम स्वरूप मुझे इतना अधिक आदर-सत्कार मिला है |”

तब उन्होंने यह गाथा कही |

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