बुद्धानुस्मृति वाले शिष्य सदा प्रबुद्ध रहते है

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बुद्धानुस्मृति वाले शिष्य सदा प्रबुद्ध रहते है

दारूशाकटिक पुत्र की कथा

यह घटना उस समय की है, जब शाक्य मुनि राजगृह में विध्यमान थे | नगर के दो लड़के, एक सम्यग्दृस्थी का पुत्र और दूसरा मिथ्यादृष्टी का पुत्र गलियों में सदैव गोलियों का खेल और अन्य खेल भी खेला करते थे | सम्यग्दृस्थी का पुत्र गोलिया फेकते समय या किसी खेल के प्रारंभ में ‘नमो बुद्धाय’ मन्त्र का उच्चारण किया करता था और तब गोलिया फेकता था या खेल प्रारंभ करता था | दूसरा, मिथ्यादृष्टी का पुत्र, किसी अन्य मंत्र का जप करता हुआ गोली फेकता था या खेल का प्रारंभ करता था | हर बार,हर खेल में सम्यग्दृस्थी वाले का पुत्र विजयी हो जाता था मिथ्यादृष्टी वाले का पुत्र पराजित | जितने वाला बालक दाव-पेच, शक्ति सभी चीजो में पराजित होने वाले लड़के से कमजोर था | फिर भी जीतता वही था | हरने वाले ने हर प्रकार के प्रयत्न किए, परन्तु वह जित नहीं सका | वह जीतने वाले के खेलने के तौर-तरीको पर विचार करता, विश्लेषण करता, चिंतन-मनन करता और एकांत में अभ्यास करता पर सब कुछ करने पर भी सफलता उसके हाथ कभी नहीं लगी |

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