मन वचन और शरीर को शुद्ध करे

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मन वचन और शरीर को शुद्ध करे

शूकर प्रेत की कथा

एक बार महामोग्गलान और लक्ष्मण थेर गृधकूट पर्वत से निचे उतर रहें थे | महामोग्गलान मुस्कुराये तो लक्ष्मण थेर ने इसका कारण पूछा | उन्होंने कहा कि विहार चलकर शास्ता के सामने यह प्रश्न पूछना |

दोनों विहार पहुंचे | शाक्य मुनि की उपस्थिति में लक्ष्मण थेर ने यह प्रश्न पूछा | तब महामोग्गलान ने बताया कि उन्होंने एक प्रेत देखा था जिसका शरीर तो मनुष्य की तरह था पर सिर सूअर की तरह था | यह सुनकर तथागत बोले, “मैंने भी इस प्रेत को बोधिवृक्ष के निकट देखा था पर उस समय किसी से नहीं कहा था क्योकि अगर मै किसी से कहता और विश्वास नही करता तो अपने लिए गलत कर्म का सुर्जन कर लेता | महामोग्गलान सच ख रहें है |”

शिष्यों ने उसके पूर्व जन्म की गति जाननी चाही कि वह कैसे इस योनी में प्रकट हुआ | तब बुद्ध ने यह कथा सुनाई |

प्राचीन काल में काश्यप बुद्ध के समय दो भिक्षु, एक साठ साल का और एक उनसठ साल का, जिनमे परस्पर गाढ़ी मैत्री थी, एक साथ एक विहार में रहते थे | वहा एक धम्मकथा सुनाने वाला आया | वे उसे गावो में धर्मकथा सुनांने के लिए ले जाने लगे | इन दोनों स्थविरों के सरल स्वभाव को देखकर धर्मकथित ने सोचा, ‘क्यों न इनमे फुट डालकर, इन्हें विहार से निकाल दु तथा यह विहार हथिया लु |” ऐसा सोचकर वह दोनों स्थविरों से अलग-अलग एक दुसरे की चुगली करने लगा | स्थविरों को उसके षड्यंत्र का भान न हुआ और वे दोनों आपस में लड़ बैठे ओर विहार से निकल गए | वर्षो बाद दोनों कही पर फिर एक साथ मिले और रो पड़े | आपस की बातचीत से पता चला कि किस प्रकार उस धर्मकथित ने उनके अंदर फुट डाली थी | वे दोनों विहार लौटे और मार-मार कर उस धर्मकथित को विहार से बाहर निकाल दिया | पर धर्मकथित ने इतना बड़ा पाप किया था कि उसके द्वारा किया गया पुण्य भी उसे नहीं बचा पाया | वह नरक लोक में जा गिरा और शूकर की योनी में जन्म लिया | शास्ता ने शिष्यों को समझाया, “मनुष्य को मन, वचन और कर्म से सदा शांत आचरण करना चाहिए |”

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