माता, पिता और राजा-दास को कैसे मारे ?

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माता, पिता और राजा-दास को कैसे मारे ?

लकुटंक भद्दीय की कथा

शाक्य मुनि जेतवन में विहरते थे | बहुत सारे आगन्तुक भिक्षु वहा पधारे | उन्हें सादर प्रणाम किया और एक ओर बैठ गए | उसी समय लकुटंक भद्दीय स्थविर नामक एक थेर शास्ता से बिदा ले थोड़ी दूर जा रहें थे | लकुटंक भद्दीय स्थविर को कई बार भिक्षुगण सामनेर मान बैठते थे क्योकि वे कद से ठिगने थे | इस बार भी शास्ता ने उनके मन की दशा देखी | उन भिक्षुओं के मन दी दशा को देखकर उनसे पूछा, “भिक्षुओं ! उस सामने जा रहें लकुटंक भिक्षु को देख रहें हो ? उसने माता-पिता की हत्या कर दी है और अब निर्दु:ख (क्षीणास्त्रव) हुआ जा रहा है |” यह बात सुनकर भिक्षु अति आश्चर्यचकित हुए और एक दुसरे का मुह देखने लगे | फिर उन्होंने साहस जुटाकर तथागत से कहा, “भन्ते ! आप यह क्या कह रहें है ? “तथागत ने उन्हें बताया, “इस भिक्षु ने न केवल माता-पिता की हत्या की है, बल्कि इसने दो क्षत्रिय राजाओं की, उनसे वासो की और संपूर्ण राष्ट्र की भी हत्या की है और यह करके भी वह निर्दोष, निष्पाप और निष्कलंक आया है |”

आगन्तुक भिक्षुओं को शाक्य-मुनि की यह बात एक पहेली की तरह लगी | वे संदेह और भ्रम में पड़ गए | माता-पिता, राजा, दास पर संपूर्ण राष्ट्र का अर्थ है ? हत्या से तथागत का तात्पर्य क्या है ? जब वे उत्तर नहीं ढूंढ पाये तो शास्ता से इस संदेह को दूर करने का आग्रह किया | तब शास्ता ने उनको स्पष्ट करते हुए कहा, “यह स्थविर अहर्त हो चूका है | तृष्णा ही सभी प्रकार के क्लेशो की जननी है | तृष्णा ही बार-बार हमे संसार की भौतिक माता की कोख में भेजती है और जन्म-मृत्यु के चक्कर में बांधे रखती है | तृष्णा समाप्त कर देने से बार-बार कोख में आने की प्रक्रिया अहंकार और तृष्णा के संयोग से हमारा कर्म सृजित होता है और हम जन्म-मरण के आवागमन से जुड़ जाते है | अगर हम माता-पिता, तृष्णा और अहंकार को समाप्त कर दे तो हम भय बंधन से मुक्त हो जायेंगे |”

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