शीलवान की सर्वत्र पूजा होती है

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शीलवान की सर्वत्र पूजा होती है

चित्त गृहपति की कथा

चित्त गृहपति अनागामी था | थेर सारिपुत्र से धर्म श्रवण करके उसने यह फल प्राप्त किया था | एक बार वह कई बैलगाड़ीयो में उपहार भरकर श्रावस्ती आया और उन्हें शाक्य-मुनि एव भिक्षुसंघ को दान में दे दिया | जब वह दान दे रहा था तब आकाश से फूलो की वर्षा होने लगी | चित्त गृहपति वहा एक महिना रुका और अपने अनुचरों के साथ खुले हृदय से दान करता रहा | फिर भी उसके भंडार पुरे के पुरे भरे रहें |

जब वह वापस जाने को हुआ तो सभी बचा-खुचा सामान विहार के भंडारागार में रखवा दिया | पर उसकी बैलगाड़िया धन-धान्य से पूरी तरह भर गई | थेर आनंद को आश्चर्य हुआ और उन्होंने तथागत से पूछा, “क्या चित्त का वैभव बढ़ना आपके पास आने का परिणाम है ? क्या उसे यह लाभ सिर्फ आपके पास आने से प्राप्त हुआ है या अन्यत्र जाने से भी प्राप्त होगा ? “शास्ता ने समझाया, “ यह उपासक श्रद्धालु है, शीलवान है, रत्नत्रय के प्रति समर्पित है | अत: यह जहा भी जाता है उसे आदर-सत्कार प्राप्त होता है |”

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