संसार के आवागमन से मुक्ति ले

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संसार के आवागमन से मुक्ति ले

वज्जिपुत्रक भिक्षु की कथा

शाक्य मुनि उन दिनों वैशाली में विराजमान थे | पूर्णिमा का दिन था | कार्तिक का मास था | नगर में उत्सव का माहौल था | चारों ओर उत्सव आयोजित हो रहें थे | मधुर संगीत लहरी बह रही थी | लोग उसमे आनंद के गोते लगा रहें थे |

उसी शोर-शराबे के बिच एक वज्जिपुत्रक भिक्षु अरण्यक के विहार से निकल कर वैशाली नगर में प्रविष्ट हुआ | उत्सव के अवसर पर बजने वाले संगीत को सुनकर उसका मन उदास हो गया | उसे लगा कि वह भिक्षु का जीवन निरर्थक ही जे रहा है | इससे तो अच्छा था कि वह गृहस्थ का जीवन जीता | उसके मुह से अकस्मात निकल पड़ा, “हम लोग दूर एकांत वन में, जंगल में कटे लकड़ी के कुंदे की तरह पड़े है | हम लोगों से जैसा कौन मन्दभाग्यवाला पापी होगा जो आज एसी सुंदर रात्रि में भी इस प्रकार पड़ा हुआ है ?” यह सोचकर उसने निर्णय लिया कि अगले दिन वह प्रव्रज्या त्याग देगा तथा एक बार फिर गृहस्थ का जीवन अपना लेगा | उसके मन की बात को देखकर एक वन देवता ने सोचा कि मै इस दु:खी भिक्षु का मन शांत करूँगा | अत: उसके सामने आकर उसने यह गाथा कही : निश्चय ही आप जैसे लोग दूर, एकांत में जंगल में एक कटे हुए कुंदे की तरह पड़े हुए है | लेकिन आपकी स्थिति से अनेक लोगों को उसी प्रकार इर्षा होती है जैसे नरक में रहने वालो को स्वर्ग में रहने वालो के प्रति होती है |

सूर्योदय हुआ | वह भिक्षु शाक्य-मुनि के सम्मुख सादर प्रणाम किया और फिर एक तरफ खड़ा हो गया | शास्ता सर्वज्ञ थे | उन्होंने उसके मन की स्थिति जान ली और उसे पांच प्रकार के दु:ख गिनाये | उन्होंने गृहस्थी में होने वाले जंजाल से उत्पनन दुःख के विषय में भी बताया और तब यह गाथा कही |

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