सभी धर्म अनात्म है

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सभी धर्म अनात्म है

अनात्म लक्षण की कथा

यह धर्मदेशना भी शास्ता ने उन्हें भिक्षुओं के संदर्भ में जेतवन में कही थी |

एक दिन शाक्य-मुनि में उन्हें सम्बोधित करते हुए समझाया, “भिक्षुओ ! सभी धर्म (पंचस्कन्ध) अनास्त है | आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है | न तो तुममे और न ही इन चीजो में कोई आत्मा है | आत्मा से भाव होता है किसी चिरस्थायी, शाश्वत, स्थिर चीज का | पर इस जगत में चिरस्थायी, शाश्वत, स्थिर नाम की तो कोई चीज है ही नहीं | सभी कुछ स्कन्ध के अलावा और कुछ नहीं है | मनुष्य कुछ और नहीं है – सभी स्कन्धो को मिलाकर, जोड़-जोडकर बनाया गया एक पुतला है | इस धर्म को जनों, इस सच्चाई को पहचानो | इस धर्म के स्वरूप को जन जाओगे तो समझ जाओगे कि आत्मा-परायण या ईश्वर पारायण से विशुद्धि का मार्ग है | अर्थात साधक को समझने की चेष्टा करनी चाहिए कि ‘सभी धर्म अनात्म है यानि लौकिक या कोलोत्तर, जो कुछ भी है, वह सब अनात्म है, ‘मै’ , ‘मेरा’ नहीं है | इस सच्चाई को जब कोई विपश्यना प्रज्ञा द्वारा जान लेता है, देख लेता है तब उसको सभी दु:खो से निर्वेद प्राप्त हो जाता है अर्थात दुःख क्षेत्र के प्रति भोक्ताभाव टूट जाता है | ऐसा अदभुत है यह विशुद्धि (विमुक्ति) का मार्ग |”

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