आंतरिक शुद्धी से ही थेर बनते है

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आंतरिक शुद्धी से ही थेर बनते है

लकुन्टक भद्धिय थेर की कथा

दूसरी बात यह है कि जो कुछ संघर्ष करके प्राप्त किया जाता है, लोग उसे ही मूल्यवान मानते है | संघर्ष ही जीवन, गति की पहचान है | एक उदाहरण है कि एक बार कक्षा में शिक्षक अपने शिष्यों को समझा रहें थे कि अंडे से तितली का बच्चा किस प्रकार निकलता है | उन्होंने समझाया कि तितली का बच्चा अंडे के अंदर सुप्त अवस्था में रहता है | समय के अंतराल में उसमे गति आती है उस गति से वह संघर्ष करना प्रारंभ कर देता है | गति की तीव्रता बढती जाती है और जब वह शक्ति के रूप में परिणत हो जाता है तो वह तितली का बच्चा अंडे को फोड़कर तितली के रूप में बाहर नीकल आता है | बच्चो को समझा कर शिक्षक कक्षा से बाहर चले गए पर जाते समय बच्चो को बताना नहीं भूले कि उस अंडे के साथ छेड़-छाड़ नहीं करना |

थोड़े समय बाद अंडा गतिमान हो गया | एक लड़के को तितली के बच्चे पर दया आ गई | उसने तितली के बच्चे को संघर्ष से बचाने के लिए क्या किया ? अंडा ही फोड़ दिया | नतीजा क्या हुआ ? तितली का बच्चा मर गया |

अत: संघर्ष करके जो प्राप्त किया जाता है वही मूल्यवान है | केवल बुढा हो जाने से, संघर्ष के अभाव में, हमे जो सम्मान मिलेंगा, वह मात्र उस उम्र के कारण मिलेंगा | अगर कोई हमे सादर प्रणाम करे और सम्मान दिखाये तो हमे इस पर गर्व नहीं करना चाहिए | वह व्यक्ति मात्र भौतिक शरीर के प्रति प्रकट कर रहा है, आंतरिक शरीर के प्रति नहीं क्योकि अंदर से तो हम शून्य है, पूर्णत: खोखले है |

कहते है कि अह्र्त्व दिया नहीं जाता है, संघर्ष कर, युद्ध कर प्रकृति से छिना जाता है | अगर यह अंश सही है तो फिर उम्र का कोई महत्व नहीं है क्योकि किसी भी उम्र का व्यक्ति, किसी भी समय, किसी भी स्थान पर इसे छीन सकता है |

अत: छोटे कद के, कम उम्र के लकुन्टक भद्धिय थेर अगर श्रामनेर नहीं थे, स्थविर थे और शीघ्र ही अह्र्त्व प्राप्त करने जा रहें थे तो इसमे आश्चर्य क्या था ?

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