आंतरिक शुद्धी से ही सुंदरता बढ़ती है

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आंतरिक शुद्धी से ही सुंदरता बढ़ती है

कुछ भिक्षुओं की कथा

      सिर्फ अपने प्रारंभ कर्म को ख़ुशी-ख़ुशी बर्दाश्त करना होगा जैसा थेर महामोग्गान ने अंतिम जन्म में किया था | जब जीवन इस स्थिति में पहुच जाता है तो फिर कर्म का चक्र एक ऐसे चक्र के रूप में परिणित हो जाता है जिसमे और अधिक उर्जा नहीं लगाई जाती | अगर हम चक्र के चलने के लिए नूतन ऊर्जा नहीं लगायेंगे तो फिर वह चक्र घर्षण के कारण धीरे-धीरे अंततः रुक जाएंगा | वह जल्दी ही रुक जायेगा अथवा थोड़े विलंब के बाद रुक जायेगा | पर वह जरुर ही रुक जायेगा |

दूसरा उदाहरण दीप का दिया जाता है | अगर हम दीप में अलग से तल न डालेंगे तो क्या होगा ? शनै: शनै: वह तेल समाप्त होता जाएगा | और एक समय आयेगा जब वह तेल पूरा का पूरा समाप्त हो जाएगा | तब वह दीपक किस प्रकार जलेगा जब तेल ही नहीं होंगा ? नूतन जीवन का निर्माण कैसे होगा अगर जीवन का निर्माण करने वाले कर्मतत्व को ही समाप्त कर दिया जायेगा ?

बुद्ध इसी बात को बोधिवृक्ष के निचे ज्ञान प्राप्ति के बाद कहते है | कहते है कि मैंने हर जन्म में आकर मेरे लिए कारागार बनाने वाले को पहचान लिया है | सारे यंत्र तोड़ दिये है, सारी निर्माण सामग्री तहस-नहस कर दी है | अब कारागार बनेगा तो कैसे ?

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