केवल भिक्षाटन मात्र से कोई भिक्षु नही हो जाता

109

केवल भिक्षाटन मात्र से कोई भिक्षु नही हो जाता

एक ब्राह्मण की कथा

इन दो गाथाओ को बुद्ध ने जेतवन में एक ब्राह्मण के संदर्भ में कहा था |

वह ब्राह्मण संसार से संन्यास लेकर किसी अन्य सम्प्रदाय में प्रव्रजित हो गया | वह भिक्षाटन करता हुआ एक दिन विचार करने लगा, “बुद्ध अपने शिष्यों को भिक्षाटन करने के कारण ‘भिक्षु’ कहकर पुकारते है | भिक्षाटन तो मै भी करता हु | अत: मै भी भिक्षु हु | मुझे भी ‘भिक्षु’ कहकर पुकारा जाना चाहिए | इसलिए वह तथागत के पास ग या और उनके पास जाकर उनसे कहा, “ हे गौतम ! आपके भिक्षुओं की तरह मै भी भिक्षाटन करता हुआ जीवन यापन करता हु | अत: मुझे भी आप ‘भिक्षु’ कहकर ही संबोधित किया करे |” पर उसकी बात मानने की बजाय बुद्ध ने उससे कहा, “ब्राह्मण ! मै किसी को भिक्षु मात्र इसलिए नहीं कहता क्योकि वह भिक्षाटन करता है | अधर्म का पालन करने वाला वस्तुतः भिक्षु कैसे हो सकता है ? इसके विपरीत जो सभी संस्कारो में ज्ञानपूर्वक व्यवहार करता है, उसे ही भिक्षु कहलाने का अधिकार है |

तब शास्ता ने ये दो गाथाए कही |

110

111

Leave a Comment