ज्यादा बोलना ज्ञानी की निशानी नहीं है |

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ज्यादा बोलना ज्ञानी की निशानी नहीं है |

षंडवर्गीय भिक्षुओं की कथा

बुद्ध ने यह गाथा षंडवर्गीय भिक्षुओं के संदर्भ में कही थी |

बुद्ध-विहार में षंडवर्गीय भिक्षुओं का एक समूह भी रहता था | वे बहुत ही अयंसमित थे, उदंड थे | अक्सर कुछ न कुछ गडबड़ी करते रहते थे और गाव हो या विहार – हर जगह सबों को अपने आचरण से दु:खी किए रहते थे | एक दिन कुछ यव भिक्षु और श्रामनेर गाव से भिक्षाटन कर अभी विहार लौट ही थे कि षंडवर्गीय भिक्षु उनसे कुछ प्प्रश्न करने लगे | तब उन भिक्षुओं ने षंडवर्गीय भिक्षुओं से कहा, “भन्ते, यह हमसे मत पूछिए |” यह सुनकर षंडवर्गीय भिक्षु बहुत नाराज हो गए और उन्हें धमकाते हुए कहा, “तुम हमको ऐसा उत्तर देते हो | बड़ो के साथ इस प्रकार जवाब देते हो | हम विद्वान् है, समझ में नही आता | दिखता नहीं कि यहा सिर्फ हम हम ही विद्वान् है ? हमारे साथ ठीक से बाते करो और हमारे प्रश्नों का ठीक से उत्तर दो | हमारी समझ और बुधिमत्ता को नहीं जानते हो | हम इतने समझदार और बुद्धिमान है कि तुम्हारे इस अपराध के बदले, हम चाहे तो तुम्हारे सर पर गन्दगी का कूड़ा डालकर तुम्हे विहार से बाहर निकाल दे” ऐसा कहकर वे अपनी विद्वता झाड़ने लगे |

एक बार गाव में भोजन दान हुआ | वहा पर ये षंडवर्गीय भिक्षु भी गए और ये श्रामनेर भी | वहा पर भी ये भिक्षु उन श्रामनेरो पर अपनी विद्वता बघारने लगे और उनके उपर बर्तन और भोजन फेकने लगे |

श्रामनेर विहार में लौटे | विहार के भिक्षुओं ने उनसे प्रश्न किया, “ भिक्षुओं आज का भोजन दान कैसा रहा ?” तब श्रामनेर बोल उठे, “भन्ते, मत पूछिये भोजन दान कैसा रहा ? षंडवर्गीय भिक्षुओं ने हमे तबाह कर दिया | हमारे उपर जूठा भोजन डाल दिया और अंत-अंत तक कहते रहें कि हम ही शांत है, हम ही विद्वान् है | इस प्रकार उन्होंने भोजन दान में बहुत गड़बड़ी की |”

बार शास्ता के कानों तक पहुंची | उन्होंने उन श्रामनेरो को बुलाया और उनसे पूरी जानकारी ली | तब शास्ता ने सबों को समझाते हुए बताया, “सिर्फ ज्यादा भाषण करने से कोई विदवान नहीं हो जाता | वरन जो शांतिप्रिय है और किसी से भी शत्रुभाव नहीं रखता और इस प्रकार दुसरो को अभय रखता है, उसे ही मै पंडित मानता हूं |”

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