बाल सफेद होने मात्र से थेर नहीं

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बाल सफेद होने मात्र से थेर नहीं

लकुन्टक भद्धिय थेर की कथा

यह गाथा शास्ता ने जेतवन में स्थविर भद्धिय के संदर्भ में कही थी | उन्हें लकुन्टक भद्धिय भी कहा जाता था क्योकि वे कद में बहुत छोटे थे |

एक दिन वह स्थविर शास्ता से मिलने गए | जब वह उन्हें प्रणाम कर जा रहें थे तब रास्ते में उसे तीस अरण्यक भिक्षुओं ने देखा | वे अरण्यक भिक्षु तथागत के पास आए, उन्हें सादर प्रणाम किया और आदरपूर्वक एक ओर बैठ गए | शास्ता ने अपनी अन्तदुर्ष्टि से देख लिया कि इन भिक्षुओं में निकट भविष्य में अहर्त प्राप्ति की संभावना है; अत: उनसे पूछा, “क्या तुमने अभी-अभी यहा दर गए स्थविर को देखा ?” “नही भन्ते, हमने किसी स्थविर को नहीं क\देखा |” “तो कोई दिखा था ?” “हा भन्ते ! एक श्रामनेर को देखा था |” “भिक्षुओं ! वह श्रामनेर नहीं था |” “भिक्षुओं ! मै उम्र से मात्र वृद्ध हो जाने वाले को या स्थविरासं मात्र पर विराजमान होने वाले को स्थविर नहीं कहता | हां, जो व्यक्ति सत्य का साक्षात्कार कर लेता है तथा सबों के साथ मैत्री की भावना रखता है, वस्तुतः वही स्थविर है |”

यह कहकर शास्ता ने ये दो गाथाए कही |

टिप्पणी : “परिपक्कव” का अर्थ क्या लेना चाहिए ? भौतिक शरीर के परिपक्वता या आंतरिक शरीर की परिपक्वता ? अगर हम भौतिक शरीर की परिपक्वता से आध्यात्मिक प्रगति को जोड़ दे तो यह हमारी बहुत बड़ी भूल होंगी | एसी सोच में यह दोष होगा कि किसी को कोई आंतरिक यत्न नहीं करना पड़ेंगा और मात्र समय के अंतराल में वह श्रामनेर से स्थविर हो जायेगा और फिर अह्र्त्व प्राप्त कर लेंगा | इस प्रकार मनुष्य के जीवन में अंतराल संघर्ष और उर्ध्व दिशागामी होने की तीव्र तडप का कोई महत्व नहीं होगा | निश्चय ही यह प्रकृति के नियम और विकास की प्रक्रिया के विपरीत होगा |

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