बाहर से साफ, भीतर से गंदा : क्या लाभ ?

121

बाहर से साफ, भीतर से गंदा : क्या लाभ ?

कुछ भिक्षुओं की कथा

शास्ता ने ये दो गाथाए कुछ भिक्षुओं के संदर्भ में जेतवन में कही थी |

एक बार कुछ श्रमण भिक्षु और कुछ श्रामनेर अपनी धर्मचर्या के क्रम में अपने उपाध्यायो के चीवर रंगने का कम कर रहें थे ऑफ़ उन्हें दूसरी अन्य सेवाए भी अर्पित कर रहें थे | कुछ स्थविरों ने उन्हें यह कार्य करते हुए देखा और उन्हें इनसे इर्षा हो गई | उन स्थविरो ने सोचा, “हम भी तो पढ़ाने-लिखाने का काम करते है और पढ़ाने-लिखाने में दक्ष भी है पर हमारी ओर कोई ध्यान नहीं डेरा और न हमारी सेवा ही करता है | हमारे पास वह कुछ भी नहीं है जो इन उपाधायो को प्राप्त है | अगर हमे यह सब कुछ प्राप्त करना अहि तो हमे तथागत के पास जाकर उनसे इस प्रकार विनती करनी चाहिए, “भन्ते ! जहा तक पढाई-लिखाई की बात है, हम भी पढ़ाने-लिखाने में अति दक्ष है, अत: इन युवक भिक्षुओं और श्रामनेर को इस प्रकार का आदेश दीजिए – “यद्यपि तुमने धर्म के गूढ़ तत्वों को दुसरे उपाध्यायो से सुना है, पढ़ा है फिर भी उनको ठीक से न सुनाओ, स्वाध्याय भी न करो और इन स्थविरों से संपर्क करो |” ऐसा करने से हम लोगों का आदर-सत्कार बढ़ जाएगा |”

इस प्रकार का विचार-मनन कर वे शाक्य-मुनि के पास गए तथा उन्हें अपना आग्रह सुना दिया | बुद्ध ने सब कुछ सुन लिया और समझ गए कि वे भिक्षु मात्र स्वार्थवश ये सारी बाते कर रहें थे | अत: उन्होंने सोचा, “मेरे धर्म शासन में इस प्रकार के लाभ सत्कार मिला करते है पर ये भिक्षुगण लाभ-सत्कार के लोभी है स्वार्थवश मात्र अपना ही लाभ चाह रहें है |” अत: शास्ता ने उनसे कहा, “तुम लाभ-सत्कार के लोभी हो अत: ऐसा जानकर केवल तुम्हारे कहने मात्र से या तुम्हारे अच्छा वक्ता होने से मै तुम्हे ‘साधू’ नहीं मन सकता | जिसे अहर्त मार्ग से इर्षा-द्वेष आदि समाप्त हो गए है वही साधू स्वरूप है | केवल वाक्-चातुर्य के बदौलत या शरीर की सुंदरता और सौन्दर्य के कारण इर्षा रखने वाला, दंभी और धूर्त व्यक्ति साधू नहीं हो जाता है | जिसकी ये सभी त्रुटीया समाप्त हो गई है वही साधू कहा जा सकता है |

टिप्पणी : बौद्ध धर्म समस्त बुराइयों को समूल नष्ट करने पर जोर देता है | हमने अक्सर देखा है कि हम अपने बगीचे में बरसात के बाद खर-पतवार साफ करते है | अगर खर-पतवार को जड़ से निकाल देते है तो वह नष्ट हो जाता है और फिर नहीं निकलता है | दूसरी ओर अगर खुरपी लेकर स्थ के ऊपर ही सफाई कर देते है तो अगली बार बरसात में, उपयुक्त वातावरण पा, खर-पतवार एक बार फिर निकल आते है |

मनुष्य जीवन में तृष्णा भी खर-पतवार की ही तरह है | अगर हम सतही पर तृष्णा को समाप्त कर देंगे तो रावण के दस सिर की तरह एक सिर कटने पर पुन: दूसरा सिर उसके स्थान पर आकर खड़ा हो जाएंगा | इस प्रकार हमारा अंततः कोई कल्याण नहीं होंगा, हम ज्यो के त्यो बने रहेंगे | दूसरी ओर अगर हम तृष्णा को अपने हृदय से जड़ से निकाल देंगे तो उस प्रक्रिया में निश्चय ही हमारे हृदय से रक्त निकलेगा, हमारा हृदय लहू-लुहान हो जाएगा पर यदि उसे हम धैर्यपूर्वक अपने ही किए कर्म के प्रसाद के रूप में स्वीकार करेंगे तब हम सदा-सदा के लिए अपने जीवन से तृष्णा समाप्त कर देंगे | तब हमे बहुत कुछ करने को बाकी नहीं रहेंगा |

122

123

Leave a Comment