मौन रखने मात्र से कोई मुनि नहीं हो जाता

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मौन रखने मात्र से कोई मुनि नहीं हो जाता

तिर्थिको की कथा

यह धर्म देशना बुद्ध ने जेतवन में किसी अन्य सम्प्रदाय के साधुओ के सम्बन्ध में कही थी |

कथा है कि जब भी तीर्थिक किसी गृहस्थ के घर पर भोजन करते तो फिर उस गृहस्थ को भोजनोपरान्त आशीर्वाद देते हुए कहते थे, “तुम्हारे घर सुख-शांति हो ,” “आन्नदित होवो, खुश रहो, आयुष्मान होवो” आदि-आदि | इस प्रकार वे इस प्रकार के मंगल वाक्यों से भक्तानुमोदक करते थे | “अमुक स्थान पर कीचड़ है, अमुक स्थान काँटों से भरा हुआ है; अत: एसी जगह पर जाना ठीक नहीं है “, वे इस प्रकार की सलाह भी दिया करते थे | इस विधि से उन गृहस्थ को अपना धन्यवाद ज्ञापन करके और फिर उनको शुभ कामना देकर ही वे उनसे विदा लेते |

इसके विपरीत बौद्ध विहार के भिक्षुगण मौन रहकर ही भोजन करते और भोजनोपरान्त धर्म प्रवचन किए बिना ही, बिना कुछ बोले ही चल देते थे क्योकि प्रथम बोधिकाल में बुद्ध में भक्तानुमोद्न की अनुमति नहीं दी थी | उस समय तक भक्तानुमोदन की परंपरा प्रारंभ नहीं हुई थी | भिक्षुओं का यह व्यवहार गृहस्थ को अच्छा नही लगता था | उल्टे उनका इस प्रकार का रुखा व्यवहार उन्हें बुरा लगता था और वे कहने लगे, “हम लोग तिर्थिको से तो भक्तानुमोद्न एव शुभकामनाए प्राप्त करते है पर आदरणीय भिक्षुगण मौन धारण किए हुए प्रस्थान कर जाते जाते है | अच्छा हो, हम इन तिर्थिको को ही निमंत्रित करके उनसे मंगलवाक्य सुना करे क्योकि इससे हमारा कुछ तो लाभ होगा | भिक्षुओं को जब इस बात का पता चला तो इस बारे में उन्होंने शास्ता को बताया | शास्ता ने उन्हें भक्तानुमोद्न की अनुमति देते हुए कहा, “भिक्षुओं ! आज से तुम लोग भी भोजन दान ग्रहण करने के बाद सुखपूर्वक भक्तानुमोद्न करो | गृहस्थ के साथ बैठो, धर्मोपदेश दो, धर्म की कथा सुनाओ |” इसके बाद बुद्ध के आदेशानुसार भोजन दान के बाद भक्तानुमोद्न की परंपरा प्रारंभ हो गई | भक्तानुमोद्न सुनकर गृहस्थ जन भी अति प्रसन्न होने लगे और अधिक उत्साह पूर्वक अधिक से अधिक भिक्षुओं को निमंत्रित करने लगे और आदर-सत्कार में भी वृद्धी हो गई | उन भिक्षुओं का पहले की तुलना में अधिक आदर-सत्कार होने लगा | इससे त्रिर्थिक जन नाराज हो गए और उन्होंने इसके प्रत्युत्तर में मौन रहेने का निर्णय ले लिया | अर्थात अब जब कभी भी ये भिक्षु भक्तानुमोद्न करेंगे, उस समय हम लोग मौन बैठा करेंगे | उन्होंने यह भी कहा, “हम मुनि है अत: हम मौन रहा करेंगे, बुद्ध के शिष्य तो सिर्फ लम्बे-लम्बे उपदेश दिया करते है |” जब बुद्ध ने यह टिप्पणी सुनी तो कहा, “भिक्षुओं ! मै चुप रहने मात्र से किसी व्यक्ति को ‘मुनि’ नहीं मानता | क्योकि लोग विभिन्न कारणों से मौन रह सकते है | कुछ लोगों को मौन इसलिए रखना पड़ता है क्योकि वे अज्ञानी है, उन्हें कुछ नहीं आता | अत: वे कुछ बोलने की स्थिति में नहीं होते | अन्य ऐसे है जिनमे आत्म विश्वास की कमी है | अत: वे बोल नहीं सकते और इस कारण चुप रहना ही श्रेयस्कर समझते है | तीसरी श्रेणी में वे लोग आते है जो किसी विषय-वस्तु को जानने के बावजूद उसे दुसरो के साथ बाटना नहीं चाहते क्योकि उन्हें लगता है कि दुसरो को जानकारी दे देने से उनका वर्चस्व ख़त्म हो जायेंगा और इस प्रकार उनका महत्व कम हो जाएंगा | इसीलिए मै कहता हु कि कोई व्यक्ति मुनि मात्र इसलिए नहीं कह्लायेंगा क्योकि वह मौन धारण करता है | इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने जीवन को पापमुक्त करता है वही ‘मुनि’ कहलाता है |

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