सभी संस्कार अनित्य है

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सभी संस्कार अनित्य है

अनित्य-लक्षण की कथा

शाक्य मुनि जेतवन में थे | उसी समय कुछ भिक्षु आये | वे उनसे ध्यान-साधना सीखकर साधना के उद्देश से वन को प्रस्थान कर गए | वे एकांत में साधना करते रहें | पर बहुत प्रयत्न करने पर भी उनकी कोई विशेष प्रगति नहीं हुई | उन्होंने सोचा कि शायद ध्यान-साधना सिखाने में कोई कमी रह गई है | फिर से चलकर सिख लेते है |

शाक्य मुनि ने अपनी दिव्यदृष्टी से जन लिया था कि ये भिक्षु अनित्य की भावना पर ध्यान करने के पथ पर अग्रसर है | अत: उन्होंने भिक्षुओं को समझाया , काम भाव आदि में सभी संस्कार उत्पन्न होकर अभाव को प्राप्त होने के कारण अनित्य ही है |” उन्होंने आगे स्पष्ट किया, “आदमी जब ऐसा विपश्यना प्रज्ञा द्वारा जान जाता है तब वह इस स्कन्धपरिहरण दुःख से निर्वेद वैराग्य पैदा करता है | अर्थात वैराग्य होने से दुःख क्षेत्र के प्रति भोक्ताभाव टूट जाता है, दुःख के साक्षात्कार से सत्य का ज्ञान करता है |” ऐसा है यह विमुक्ति का मार्ग | ऐसा समझाते हुए उन्होंने यह गाथा कही |

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