सही भिक्षु कौन है ?

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सही भिक्षु कौन है ?

एक ब्राह्मण की कथा

टिप्पणी : बौद्ध धर्म में बाह्य कर्म-कांडो को आडंबर की तरह देखा गया है | इसलिए उनका कोई महत्व नहीं है | वास्तव में महत्व की चीज है – आंतरिक रूपांतर | और आंतरिक रूपांतर के लिए बाह्य आडंबरो की कतई आवश्यकता नही |

`     कहा गया है : “मन न मुंडाया, मुड़ाये जोगी कपड़ा |” अर्थात संन्यासी ने अपने मन को नहीं रंगा अर्थात अपने मन को परिशुद्ध, पवित्र नहीं किया | उसके विपरीत सिर्फ बाहर से गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया तो फिर वह संन्यासी कैसे कहा जा सकता है ?

संन्यासी किसे कहेंगे ? उसे, जिसने जीवन से संन्यास ले लिया है, सांसारिक चीजों से मुह मोड़ लिया है और इस कारण भोजन के लिए, संसार पर आश्रित रहने के कारण, भिक्षाटन करता है, लेकिन वास्तव में महत्व की जो चीज है वह है जीवन से संन्यास और जीवन से संन्यास की कहानी मन से शुरू होती है | मन भौतिक शरीर की तरह आँखों से दिखाने वाली कोई चीज नहीं है | अत: उसका रूपांतरण पूर्णत: आंतरिक प्रक्रिया है जिसे इस भौतिक जगत के नेत्रों से नहीं देखा जा सकता है |

 

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