सारे संसार दुःखमय है

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सारे संसार दुःखमय है

दुःख लक्षण की कथा

यह दूसरी गाथा भी जेतवन में उन्ही भिक्षुओं के संदर्भ में कही गई है |

कुछ समय बाद एक दिन शाक्य मुनि ने अपनी अंतदृष्टी से देखा कि इन भिक्षुओं में दुःख लक्षण भावना है तो फिर उन्होंने भिक्षुओं को बुलाया और उनसे बोले, “भिक्षुओं ! सभी संसार प्रतिपिडीत होने के कारण दुःखमय है | यह सारा संसारही दुःखमय है | यहा संसार में सुख की कोई किरण नहीं है | जिस दिन समझ लोगे कि सभी संसार ही दुःख-स्वरूप है | उस दिन से तुम दु:खो से छुटकारा पाने लगोंगे | प्रज्ञा से जब यह पहचान लोगे तो सभी दु:खो से मुक्ति हो जायेंगी | यही निर्वाण का मार्ग है, यही चित्त के विशुद्धि की राह है | अत: मनुष्य को समझने की कोशिश करनी चाहिए कि सारे संस्कार दुःखदायक है अर्थात जो उत्त्पन होता है, वह नाशवान होने के कारण दुःखदायी है | इस सच्चाई को जब कोई विपश्यना ज्ञान से देख लेता है, जान और समझ लेता है अर्थात दुःख क्षेत्र के प्रति भोक्ताभाव टूट जाता है – तब वह विशुद्धि (विमुक्ति) का मार्ग प्राप्त कर लेता है |”

तब शास्ता ने यह गाथा कही |

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