सिर मुंडा लेने से कोई संन्यासी नहीं हो जाता

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सिर मुंडा लेने से कोई संन्यासी नहीं हो जाता

भिक्खु ह्त्थक की कथा

इन दो गाथाओ को बुद्ध ने जेतवन विहार में ह्त्थक नामक भिक्षु को संबोधित कर कहा था |

श्रावस्ती में ह्त्थक नाम का एक भिक्षु था | वह अक्सर वाद-विवाद में लगा रहता था और शास्त्रार्थ में अधिकांशत: पारजित हो जाता था | लेकिन वह अपनी पराजय को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता | अत: हर बार शास्त्रीय वाद-विवादों में पराजित हो जाने के बाद वह विद्वानों को पुन: चुनौती देते हुए कहता था, “तुम अमुक स्थान पर मुझसे अमुक समय पर मिले | वही शास्त्रार्थ होगा और तय होगा कि हम दोनों में विद्वान् कौन है |” लेकिन अमुक स्थान वर वह निर्धारित समय पर न पहुंचकर उससे पहले ही पहुच जाता था | उसके प्रतिद्वंदी निर्धारित समय से पूर्व नहीं आते थे | अत: प्रतिवादियो के न आने पर उपस्थित भीड़ से कहता था, “देखो, मेरे प्रतिवादी मुझसे इतना अधिक भयभीत है कि उनमे हिम्मत ही नहीं कि वे आकर मुझसे मिले | जो व्यक्ति मेरे भय से मुझसे मिलने नहीं आ पाया वह मुझसे शास्त्रार्थ क्या करेगा ? उन्होंने अपनी हार मान ली | वे पराजित हो गये” इस प्रकार वह अपने प्रतिद्वंदी की पराजय और अपनी विजय की घोषणा करता हुआ चला जाता था | जब कभी कही पर पुन: पराजित हो जाता तो पुन: यही युक्ति लगाता था |

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