न्याय की तराजू पर न्याय करना

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न्याय की तराजू पर न्याय करना

न्यायाधीश की कथा

इन दोनों गाथाओ को बुद्ध ने कुछ घुसखोर न्यायाधीशो के संदर्भ में कहा था |

एक दिन कुछ भिक्षुगण श्रावस्ती नगर के उत्तरी द्वार के पास स्थित ग्राम में भिक्षाटन के लिए गए | भिक्षाटन से निवृत्त हो उत्तर द्वार से वे नगर में प्रवेश कर गए | भिक्षाटन से बौद्ध विहार लौटते हुए उन्हें नगर के मुख्य मार्ग से आना पड़ा जहा न्यायाधीशो के कार्यालय भी थे | जब वे नगर के मध्य से गुजर रहें थे, आकाश में बादल छा गए और वर्षा होने लगी | वर्षा से बचने के लिए उन्हें एक छत चाहिए थी | इधर-उधर और कुछ तो दिखा नहीं | सामने न्यायाधीशो की एक अदालत दिखी और बारिश से बचने के लिए वे उसमे घुस गए | उस न्यायालय में उन्होंने न्यायाधीशो को रिश्वत लेते हुए देखा | वे विवाद में उभय पक्षों के विवाद को इंसाफ के तराजू पर तौलकर निर्णय देने के बजाय जो विवाद में सही नहीं था उससे रिश्वत लेकर, उसके पक्ष में निर्णय दे रहें थे | इसे देखकर उन्होंने सोचा, “अरे ये न्यायाधीश तो अधर्मी है | अभी तक हम समझते थे कि ये न्याय की कुर्सी पर बैठकर इंसाफ के पक्ष में फैसला देते होंगे | ये तो असत्य मार्ग का आचरण कर अधार्मिक निर्णय दे रहें है | हम तो इन्हें धर्म पर आश्रित होकर निर्णय देने वाला समझते थे |”

थोड़ी देर बार जब वर्षा रुक गई तो वे अदालत से बाहर निकले और बौद्ध विहार चले गए | वहा पहुचने पर उन्होंने तथागत को सारी बाते बताई कि किस प्रकार न्यायाधीशगण रिश्वत लेकर, न्याय का गला घोंटकर, गलत एव अन्यायपूर्ण निर्णय दे रहें थे |

तब बुद्ध ने उन्हें समझाया, “भिक्षुओं ! जो न्यायाधीश, स्वेच्छाचारी होकर, अधर्म पर आधारित निर्णय देते है वे न्यायाधीश धार्मिक नहीं कहला सकते | इसके विपरीत जो न्यायाधीश अपराध की गहराई में जाते है और अंत:स्थल तक पहुंचकर निर्णय देते है, वे ही वस्तुत: धार्मिक कहलायेंगे |”

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धर्ममार्ग पर न्यायी कौन है ?

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धर्ममार्ग पर न्यायी कौन है ?

न्यायाधीश की कथा

इस प्रकार उपदेश देते हुए बुद्ध ने ये गाथाये कही |

टिप्पणी : बौद्ध धर्म की रीढ़ है – “कर्म का सिधान्त” अर्थात हम जैसा बोयेंगे वैसा ही काटेंगे | कांटे बोयेंगे तो कांटे काटेंगे और फुल बोयेंगे तो फुल ही काटेंगे | यह प्रकृति का शाश्वत नियम रहा है, और सदैव रहेगा |

उसी प्रकार बुरे कर्म करने वाला अपने लिए बुरे फल का प्रबंध कर चूका है | अब यह मात्र समय की बात है कि वह फल आज ही काट ले या कल को काटे या परसों या फिर तरसो | संभव है इस जन्म में नहीं काटना पड़े पर उसका अर्थ यह नहीं कि उसे फल को काटने से मुक्ति मिल गई | मुक्ति नहीं मिली है; फल काटने का समय मात्र थोडा आगे बढ़ गया है | इस प्रकार गलत निर्णय देने वाले न्यायाधीश ने अपने लिए अपनी सजा आज ही सुनिश्चित कर ली है | उस निर्णय को मात्र सुरक्षित रखा गया है और जैसे ही उपयुक्त समय होगा, उस न्यायाधीश को उसके किए का फल सुना दिया जायेगा | अत: गलत निर्णय देकर इस कथा के सभी न्यायाधीशो ने अपने बचाव का पूरा अवसर गँवा दिया |

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ज्यादा बोलना ज्ञानी की निशानी नहीं है |

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ज्यादा बोलना ज्ञानी की निशानी नहीं है |

षंडवर्गीय भिक्षुओं की कथा

बुद्ध ने यह गाथा षंडवर्गीय भिक्षुओं के संदर्भ में कही थी |

बुद्ध-विहार में षंडवर्गीय भिक्षुओं का एक समूह भी रहता था | वे बहुत ही अयंसमित थे, उदंड थे | अक्सर कुछ न कुछ गडबड़ी करते रहते थे और गाव हो या विहार – हर जगह सबों को अपने आचरण से दु:खी किए रहते थे | एक दिन कुछ यव भिक्षु और श्रामनेर गाव से भिक्षाटन कर अभी विहार लौट ही थे कि षंडवर्गीय भिक्षु उनसे कुछ प्प्रश्न करने लगे | तब उन भिक्षुओं ने षंडवर्गीय भिक्षुओं से कहा, “भन्ते, यह हमसे मत पूछिए |” यह सुनकर षंडवर्गीय भिक्षु बहुत नाराज हो गए और उन्हें धमकाते हुए कहा, “तुम हमको ऐसा उत्तर देते हो | बड़ो के साथ इस प्रकार जवाब देते हो | हम विद्वान् है, समझ में नही आता | दिखता नहीं कि यहा सिर्फ हम हम ही विद्वान् है ? हमारे साथ ठीक से बाते करो और हमारे प्रश्नों का ठीक से उत्तर दो | हमारी समझ और बुधिमत्ता को नहीं जानते हो | हम इतने समझदार और बुद्धिमान है कि तुम्हारे इस अपराध के बदले, हम चाहे तो तुम्हारे सर पर गन्दगी का कूड़ा डालकर तुम्हे विहार से बाहर निकाल दे” ऐसा कहकर वे अपनी विद्वता झाड़ने लगे |

एक बार गाव में भोजन दान हुआ | वहा पर ये षंडवर्गीय भिक्षु भी गए और ये श्रामनेर भी | वहा पर भी ये भिक्षु उन श्रामनेरो पर अपनी विद्वता बघारने लगे और उनके उपर बर्तन और भोजन फेकने लगे |

श्रामनेर विहार में लौटे | विहार के भिक्षुओं ने उनसे प्रश्न किया, “ भिक्षुओं आज का भोजन दान कैसा रहा ?” तब श्रामनेर बोल उठे, “भन्ते, मत पूछिये भोजन दान कैसा रहा ? षंडवर्गीय भिक्षुओं ने हमे तबाह कर दिया | हमारे उपर जूठा भोजन डाल दिया और अंत-अंत तक कहते रहें कि हम ही शांत है, हम ही विद्वान् है | इस प्रकार उन्होंने भोजन दान में बहुत गड़बड़ी की |”

बार शास्ता के कानों तक पहुंची | उन्होंने उन श्रामनेरो को बुलाया और उनसे पूरी जानकारी ली | तब शास्ता ने सबों को समझाते हुए बताया, “सिर्फ ज्यादा भाषण करने से कोई विदवान नहीं हो जाता | वरन जो शांतिप्रिय है और किसी से भी शत्रुभाव नहीं रखता और इस प्रकार दुसरो को अभय रखता है, उसे ही मै पंडित मानता हूं |”

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सही धर्मधर कौन है ?

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सही धर्मधर कौन है ?

थेर एकुदान की कथा

यह गाथा बुद्ध ने एक भिक्षु के संदर्भ में कही जो अहर्त हो गया था |

यह भिक्षु श्रावस्ती के पास ही एक वन-खंड में रहता था | उसे लोग एकुदान पुकारते थे क्योकि उसे एक ही (गाथा) उदान पूरी तरह याद थी | “उच्च विचारो वाले, सतत सजग, क्षमाशील, सतर्क, शांत भिक्षु को दु:ख नहीं सताते |” लेकिन यह भिक्षु यधपि एक ही गाथा जानता था पर वह इस गाथा द्वारा प्रतिपादित अर्थ को पूरी तरह जानता था | प्रत्येक उपोसथ के दिन वह सबों को धर्म-श्रवण करने के लिए कहता था और स्वय उस उदान को गाकर सुनाता था | उसकी एक ही गाथा को सुनकर वन देवता उसका साधुवाद करते थे और इस प्रकार वह जंगल उनकी प्रशंसा से गुंजित हो उठता था |

किसी उपोसथ के दिन ज्ञानी भिक्षु, जो त्रिपिटक के विद्वान थे, अपने भिक्षुओं के साथ वहा पधारे | एकुदान ने उन दोनों बुजुर्ग भिक्षुओं से धर्म प्रवचन करने की प्रार्थना की | उन्होंने चाहा कि क्या इस दूर-दराज की जगह पर बहुत सारे श्रोतागण थे | एकुदान ने ‘हा’ में उत्तर दिया और यह भी कहा कि यहाँ वन देवता भी आते थे और धर्म-प्रवचन के बाद प्रशंसा करते थे तथा साधुवाद देते थे | इसलिए दोनों त्रिपिटकाचार्य ने एक-एक कर व्याख्यान दिया लेकिन जब उनके व्याख्यान समाप्त हुए, तब जंगल के देवतागण की ओर से किसी भी प्रकार का साधुवाद नहीं हुआ | दोनों ज्ञानी भिक्षु आश्चर्यचकित हो गए और उन्हें संदेह हुआ कि एकुदान ने सच कहा था या नहीं | लेकिन एकुदान ने दोहराया कि वन देवता सदा आते थे तथा गाथा के अंत में साधुवाद देते थे | अत: दोनों आचार्यो ने स्वय शिक्षा देने के लिए कहा | एकुदान ने उसी एक गाथा को गाकर सुना दिया जो उसे याद था | उस गाथा के अंत में वन देवता पुन: सदा की तरह साधुवाद देने लगे | उन दोनों विदवान के साथ जो भिक्षु आए थे उन्होंने शिकायत कि वन में रहने वाले देवता पक्षपात कर रहें थे | जेतवन विहार आने पर इस घटना की जानकारी शास्ता को दी गई | बुद्ध ने उन्हें समझाया, “भिक्षुगण ! मै नहीं कहता कि एक भिक्षु जो बहुत कुछ जानता है और धर्म के बारे में बहुत कुछ बोल सकता है, वह सचमुच ही स्वय धर्मंनिष्ठ है | जिसने सिर्फ थोडा सिखा है और धर्म का सिर्फ एक पाठ ही जानता है पर चार आर्य सत्य को खूब अच्छी तरह समझता है और सदैव सतर्क और जागरूक रहता है, वस्तुत: वही धर्म स्थित कहा जा सकता है |”

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बाल सफेद होने मात्र से थेर नहीं

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बाल सफेद होने मात्र से थेर नहीं

लकुन्टक भद्धिय थेर की कथा

यह गाथा शास्ता ने जेतवन में स्थविर भद्धिय के संदर्भ में कही थी | उन्हें लकुन्टक भद्धिय भी कहा जाता था क्योकि वे कद में बहुत छोटे थे |

एक दिन वह स्थविर शास्ता से मिलने गए | जब वह उन्हें प्रणाम कर जा रहें थे तब रास्ते में उसे तीस अरण्यक भिक्षुओं ने देखा | वे अरण्यक भिक्षु तथागत के पास आए, उन्हें सादर प्रणाम किया और आदरपूर्वक एक ओर बैठ गए | शास्ता ने अपनी अन्तदुर्ष्टि से देख लिया कि इन भिक्षुओं में निकट भविष्य में अहर्त प्राप्ति की संभावना है; अत: उनसे पूछा, “क्या तुमने अभी-अभी यहा दर गए स्थविर को देखा ?” “नही भन्ते, हमने किसी स्थविर को नहीं क\देखा |” “तो कोई दिखा था ?” “हा भन्ते ! एक श्रामनेर को देखा था |” “भिक्षुओं ! वह श्रामनेर नहीं था |” “भिक्षुओं ! मै उम्र से मात्र वृद्ध हो जाने वाले को या स्थविरासं मात्र पर विराजमान होने वाले को स्थविर नहीं कहता | हां, जो व्यक्ति सत्य का साक्षात्कार कर लेता है तथा सबों के साथ मैत्री की भावना रखता है, वस्तुतः वही स्थविर है |”

यह कहकर शास्ता ने ये दो गाथाए कही |

टिप्पणी : “परिपक्कव” का अर्थ क्या लेना चाहिए ? भौतिक शरीर के परिपक्वता या आंतरिक शरीर की परिपक्वता ? अगर हम भौतिक शरीर की परिपक्वता से आध्यात्मिक प्रगति को जोड़ दे तो यह हमारी बहुत बड़ी भूल होंगी | एसी सोच में यह दोष होगा कि किसी को कोई आंतरिक यत्न नहीं करना पड़ेंगा और मात्र समय के अंतराल में वह श्रामनेर से स्थविर हो जायेगा और फिर अह्र्त्व प्राप्त कर लेंगा | इस प्रकार मनुष्य के जीवन में अंतराल संघर्ष और उर्ध्व दिशागामी होने की तीव्र तडप का कोई महत्व नहीं होगा | निश्चय ही यह प्रकृति के नियम और विकास की प्रक्रिया के विपरीत होगा |

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आंतरिक शुद्धी से ही थेर बनते है

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आंतरिक शुद्धी से ही थेर बनते है

लकुन्टक भद्धिय थेर की कथा

दूसरी बात यह है कि जो कुछ संघर्ष करके प्राप्त किया जाता है, लोग उसे ही मूल्यवान मानते है | संघर्ष ही जीवन, गति की पहचान है | एक उदाहरण है कि एक बार कक्षा में शिक्षक अपने शिष्यों को समझा रहें थे कि अंडे से तितली का बच्चा किस प्रकार निकलता है | उन्होंने समझाया कि तितली का बच्चा अंडे के अंदर सुप्त अवस्था में रहता है | समय के अंतराल में उसमे गति आती है उस गति से वह संघर्ष करना प्रारंभ कर देता है | गति की तीव्रता बढती जाती है और जब वह शक्ति के रूप में परिणत हो जाता है तो वह तितली का बच्चा अंडे को फोड़कर तितली के रूप में बाहर नीकल आता है | बच्चो को समझा कर शिक्षक कक्षा से बाहर चले गए पर जाते समय बच्चो को बताना नहीं भूले कि उस अंडे के साथ छेड़-छाड़ नहीं करना |

थोड़े समय बाद अंडा गतिमान हो गया | एक लड़के को तितली के बच्चे पर दया आ गई | उसने तितली के बच्चे को संघर्ष से बचाने के लिए क्या किया ? अंडा ही फोड़ दिया | नतीजा क्या हुआ ? तितली का बच्चा मर गया |

अत: संघर्ष करके जो प्राप्त किया जाता है वही मूल्यवान है | केवल बुढा हो जाने से, संघर्ष के अभाव में, हमे जो सम्मान मिलेंगा, वह मात्र उस उम्र के कारण मिलेंगा | अगर कोई हमे सादर प्रणाम करे और सम्मान दिखाये तो हमे इस पर गर्व नहीं करना चाहिए | वह व्यक्ति मात्र भौतिक शरीर के प्रति प्रकट कर रहा है, आंतरिक शरीर के प्रति नहीं क्योकि अंदर से तो हम शून्य है, पूर्णत: खोखले है |

कहते है कि अह्र्त्व दिया नहीं जाता है, संघर्ष कर, युद्ध कर प्रकृति से छिना जाता है | अगर यह अंश सही है तो फिर उम्र का कोई महत्व नहीं है क्योकि किसी भी उम्र का व्यक्ति, किसी भी समय, किसी भी स्थान पर इसे छीन सकता है |

अत: छोटे कद के, कम उम्र के लकुन्टक भद्धिय थेर अगर श्रामनेर नहीं थे, स्थविर थे और शीघ्र ही अह्र्त्व प्राप्त करने जा रहें थे तो इसमे आश्चर्य क्या था ?

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बाहर से साफ, भीतर से गंदा : क्या लाभ ?

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बाहर से साफ, भीतर से गंदा : क्या लाभ ?

कुछ भिक्षुओं की कथा

शास्ता ने ये दो गाथाए कुछ भिक्षुओं के संदर्भ में जेतवन में कही थी |

एक बार कुछ श्रमण भिक्षु और कुछ श्रामनेर अपनी धर्मचर्या के क्रम में अपने उपाध्यायो के चीवर रंगने का कम कर रहें थे ऑफ़ उन्हें दूसरी अन्य सेवाए भी अर्पित कर रहें थे | कुछ स्थविरों ने उन्हें यह कार्य करते हुए देखा और उन्हें इनसे इर्षा हो गई | उन स्थविरो ने सोचा, “हम भी तो पढ़ाने-लिखाने का काम करते है और पढ़ाने-लिखाने में दक्ष भी है पर हमारी ओर कोई ध्यान नहीं डेरा और न हमारी सेवा ही करता है | हमारे पास वह कुछ भी नहीं है जो इन उपाधायो को प्राप्त है | अगर हमे यह सब कुछ प्राप्त करना अहि तो हमे तथागत के पास जाकर उनसे इस प्रकार विनती करनी चाहिए, “भन्ते ! जहा तक पढाई-लिखाई की बात है, हम भी पढ़ाने-लिखाने में अति दक्ष है, अत: इन युवक भिक्षुओं और श्रामनेर को इस प्रकार का आदेश दीजिए – “यद्यपि तुमने धर्म के गूढ़ तत्वों को दुसरे उपाध्यायो से सुना है, पढ़ा है फिर भी उनको ठीक से न सुनाओ, स्वाध्याय भी न करो और इन स्थविरों से संपर्क करो |” ऐसा करने से हम लोगों का आदर-सत्कार बढ़ जाएगा |”

इस प्रकार का विचार-मनन कर वे शाक्य-मुनि के पास गए तथा उन्हें अपना आग्रह सुना दिया | बुद्ध ने सब कुछ सुन लिया और समझ गए कि वे भिक्षु मात्र स्वार्थवश ये सारी बाते कर रहें थे | अत: उन्होंने सोचा, “मेरे धर्म शासन में इस प्रकार के लाभ सत्कार मिला करते है पर ये भिक्षुगण लाभ-सत्कार के लोभी है स्वार्थवश मात्र अपना ही लाभ चाह रहें है |” अत: शास्ता ने उनसे कहा, “तुम लाभ-सत्कार के लोभी हो अत: ऐसा जानकर केवल तुम्हारे कहने मात्र से या तुम्हारे अच्छा वक्ता होने से मै तुम्हे ‘साधू’ नहीं मन सकता | जिसे अहर्त मार्ग से इर्षा-द्वेष आदि समाप्त हो गए है वही साधू स्वरूप है | केवल वाक्-चातुर्य के बदौलत या शरीर की सुंदरता और सौन्दर्य के कारण इर्षा रखने वाला, दंभी और धूर्त व्यक्ति साधू नहीं हो जाता है | जिसकी ये सभी त्रुटीया समाप्त हो गई है वही साधू कहा जा सकता है |

टिप्पणी : बौद्ध धर्म समस्त बुराइयों को समूल नष्ट करने पर जोर देता है | हमने अक्सर देखा है कि हम अपने बगीचे में बरसात के बाद खर-पतवार साफ करते है | अगर खर-पतवार को जड़ से निकाल देते है तो वह नष्ट हो जाता है और फिर नहीं निकलता है | दूसरी ओर अगर खुरपी लेकर स्थ के ऊपर ही सफाई कर देते है तो अगली बार बरसात में, उपयुक्त वातावरण पा, खर-पतवार एक बार फिर निकल आते है |

मनुष्य जीवन में तृष्णा भी खर-पतवार की ही तरह है | अगर हम सतही पर तृष्णा को समाप्त कर देंगे तो रावण के दस सिर की तरह एक सिर कटने पर पुन: दूसरा सिर उसके स्थान पर आकर खड़ा हो जाएंगा | इस प्रकार हमारा अंततः कोई कल्याण नहीं होंगा, हम ज्यो के त्यो बने रहेंगे | दूसरी ओर अगर हम तृष्णा को अपने हृदय से जड़ से निकाल देंगे तो उस प्रक्रिया में निश्चय ही हमारे हृदय से रक्त निकलेगा, हमारा हृदय लहू-लुहान हो जाएगा पर यदि उसे हम धैर्यपूर्वक अपने ही किए कर्म के प्रसाद के रूप में स्वीकार करेंगे तब हम सदा-सदा के लिए अपने जीवन से तृष्णा समाप्त कर देंगे | तब हमे बहुत कुछ करने को बाकी नहीं रहेंगा |

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