आलसी प्रज्ञा के मार्ग को प्राप्त नहीं कर सकता

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आलसी प्रज्ञा के मार्ग को प्राप्त नहीं कर सकता

योगाभ्यासी तिस्स थेर की कथा

जेतवन में एक समय बहुत सारे कुलपुत्र शास्ता से प्रव्रजित हुए | उनसे प्रव्रज्या ग्रहण कर ध्यान-साधना की विधि सिख जंगल की ओर तपस्या करने हेतु प्रस्थान कर गए | उनमे से सिर्फ तिस्स नाम का एक भिक्षु विहार में रह गया |

वन में उन भिक्षुओं ने सतत साधना की, घोर तपस्या की और सभी ने अह्र्त्व प्राप्त कर लिया | वे सभी वन से शाक्य-मुनि से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए चल पड़े | अपनी उपलब्धी से वे बहुत प्रसन्न थे | हृदय उमंग और उत्साह से भरा हुआ था | रास्ते में किसी उपासक ने उन्हें भोजन-दान दिया और अगले दिन के लिए भी आमंत्रित कर दिया |

श्रावस्ती पहुचकर, विहार में पात्र-चीवर रखकर इन सफल भिक्षुओं ने संध्या बेला में शास्ता को सादर प्रणाम किया और अपने विषय में बताया | शाक्य-मुनि ने उनके कार्य और उपलब्धी पर संतोष व्यक्त किया और उनका स्वागत सत्कार किया |

अहर्त रहित भिक्षु तिस्स ने सोचा, “शास्ता के पास इन सफल भिक्षुओं के स्वागत के लिए शब्दों की कमी पद रही है और इसकी विपरीत मुझे कहने के लिए उनके पास एक भी शब्द नहीं है क्योकि मैंने अह्र्त्व प्राप्त नहीं किया | मै आज ही अह्र्त्व प्राप्त करूँगा |”

तिस्स ने रात भर अह्र्त्व प्राप्ति हेतु चंक्रमणत्व किया | इससे थककर वह एक पत्थर पर गिर गया और उसके जांघ की एक हड्डी टूट गई | वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा | उसकी आवाज सुन भिक्षुगण दौड़े-दौड़े आए और उसकी मरहम पट्टी की | इलाज करते-करते सुबह हो गई | वे उपासक के पास पुन: भोजनदान हेतु नहीं जा पाये | शास्ता को इस बात की जानकारी हुई | उन्होंने बताया कि पूर्व जन्म में तिस्स तुम्हारे लिए व्यवधान बन चूका था | उन्होंने यह भी समझाया, “भिक्षुओं ! जो परिश्रम करने के समय परिश्रम (उद्धोग) नहीं करता उस समय उत्साहहीन मन वाला होकर बैठा रहता है, वह आलसी समय के अंतराल से ध्यान आदि में कोई विशिष्ट उपलब्धी प्राप्त नहीं कर पाता |

इस प्रसंग में उन्होंने यह गाथा कही |

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प्रज्ञा की वृद्धी के लिए यत्न करे

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प्रज्ञा की वृद्धी के लिए यत्न करे

पोटील स्थविर की कथा

जेतवन विहार में पोटील नामक एक स्थविर रहते थे | वे त्रिपिटक के ज्ञानी थे, प्रवचन तो देते थे पर स्वयं मार्ग फल प्राप्त नहीं किया था | शास्ता को ज्ञात था कि इनके अंदर अभी भी अहंकार समाप्त नहीं हुआ है | अत: वे उसे ‘तुच्छ पोटील’ कहकर संबोधित करते थे |

एक दिन पोटील ने सोचा, :मैंने त्रिपिटक का गहराई से अध्ययन कर लिया है | अन्य धर्मग्रंथो को भी पढ़ा है | फिर भी तथागत मुझे ‘तुच्छ पोटील’ कहकर ही संबोधित करते है; शायद इसलिए कि मैंने अह्र्त्व प्राप्त नहीं किया है |” ऐसा सोचकर उसे अपने आप बहुत ग्लानी हुई और प्रात: काल ही वह धर्मश्रवण कर विहार से निकल गया | जेतवन से तीस योजन दूर चल एक जंगल में पहुच गया जहा तीस अहर्त भिक्षु साधना करते थे | वहा पहुच कर उसने सादर प्रणाम किया और संघस्थविर से बोला, “अह्र्त्व प्राप्ति हेतु कृपया मेरा आश्रय बनिए |” संघस्थविर इसके लिए तैयार न हुए क्योकि उन्हें मालूम था कि इसे अपने पढ़े हुए का अभिमान है | सभी भिक्षु उसे टालते रहें | अंत में उसे एक सात वर्षीय भिक्षु के पास भेज दिया | इस प्रकार पोटील का मान मर्दन हो गया |

जब पोटील का मान मर्दन हो गया तब उसने श्रामनेर से प्रार्थना की, “आप मेरे अहर्त बनने का आधार बनिए | मै आपकी सभी आज्ञाओ का पालन करूँगा | अगर आग में कूदने के लिए कहेंगे तो आग में भी कूद जाऊँगा |” तब श्रामनेर ने उसकी परीक्षा लेनी चाही | उससे कहा, “आप जिस स्थिति में है उसी स्थिति में सामने के सरोवर में कूद जाइए |” पोटील कूदने को उद्धत हुए तो श्रामनेर ने उसे बुला लिया फिर श्रामनेर ने उसे समझाया कि मनोद्वार के माध्यम से साधना प्रारंभ करो | पोटील को लगा कि जैसे अंधकार में किसी ने दीपक जला दिया हो | वह अपने मलयुक्त शरीर के ऊपर चिंतन करता हुआ साधना करने लगा |

शास्ता ने यह सब कुछ देखा और पोटील के सामने अपनी दिव्य आभा बिखेरते हुए यह गाथा कही |

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आसक्ति और कामना को काटो

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आसक्ति और कामना को काटो

वृद्ध भिक्षुओं की कथा

जिन दिनों बुद्ध जेतवन में वास करते थे उन दिनों बहुत सारे वृद्ध पुरुष एक साथ प्रव्रजित हो गए | वे सभी अपने गृहस्थ आश्रम में अच्छे-अच्छे परिवारों में पैदा हुए थे तथा आपस में मित्र भी थे | वे सत्कार के फल से तथा तथागत के प्रवचनों से प्रभावित होकर भिक्षु हो गए थे | यह सोचकर कि ‘अब हम बूढ़े हो रहें है, अब हमारा गृहस्थ आश्रम में रहना शोभनीय नहीं है’ वे प्रव्रजित हो गए थे | शास्ता ने उन्हें प्रव्रज्या दिला तो दी थी पर वे धर्म श्रवण का दृढ़ता से पालन करने में असमर्थ थे | अत: उन्होंने विहार के बाहर ही एक पर्णशाला बना ली और उसी में रहने लगे | भिक्षाटन हेतु जब वे जाते तो अपने परिवार वालो के पास ही जाते | उनमे से एक की पत्नी का नाम मधुरपाचिका या महामधुरिका था | वह बहुत ही स्वादिष्ट भोजन बनती थी और उन्हें दान स्वरूप देती थी | वे सभी भिक्षु भिक्षाटन में जो भोजन मिलता उसे लेकर उस स्त्री के घर आते थे | वह स्त्री भी सूप, व्यंजन आदि जो कुछ बना होता, दे देती थी | वे सभी उसी के घर में बैठकर खाना खाया करते थे |

एक दिन किसी गंभीर बीमारी के कारण मधुरपाचिका का देहान्त हो गया | वे सभी वृद्ध स्थविर उस स्थविर के घर पर एकत्र हुए जिसकी वह पत्नी थी और आपस में गले लगकर जोर-जोर से विलाप करने लगे, “उपासिका, मधुरपाचिका का देहान्त हो गया | वह हम लोगों पर अनन्य कृपा रखती थी | अब उसके जैसा कृपालु कहा मिलेंगा ?” इस प्रकार करुणापूर्ण दृश्य उत्पन्न हो गया | अन्य भिक्षुओं ने उनका करुण क्रंदन सुना तो उनके पास आए और उनसे क्रंदन का कारण पूछा | उन्होंने बता दिया कि मधुरपाचिका संसार से चल बसी |

संध्या बेला में धर्म सभा में यह बात उठी | तब शास्ता ने काक जातक कहकर पूर्व काल की घटना सुनाई, “भिक्षुओं ! आज से बहुत जन्मो पूर्व ये सभी काक योनी में उत्पन्न हु थे | वे समुद्र के किनारे रहते थे | एक बार समुद्र के किनारे विचरण करते समय उनकी मादा कौआ (काकी) समुद्र में बह गई | सभी मिलकर रोने लगे, विलखने लगे | उन्होंने निश्चय किया कि हम सभी मिलकर समुद्र को सुखा डालेंगे और काकी को फिर प्राप्त कर लेंगे | तब इन कौओ ने अपने चोंच में समुद्र का जल भर कर बाहर फेकना शुरू किया | लेकिन वे जितना जल समुद्र से बाहर फेकते थे उससे अधिक जल समुद्र में आ गिरता था | इस प्रकार उस जन्म में भी ये बहुत दु:खी हुए |”

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काम वासना के बंधन से मुक्त हो

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काम वासना के बंधन से मुक्त हो

वृद्ध भिक्षुओं की कथा

उनके पूर्व जन्म की कथा कहते हुए शाक्य-मुनि ने उनका कथन सुनाया, “हम समुद्र को सुखाने का प्रयत्न कर रहें पर पर समुद्र को सुखाने में सफल नहीं हो रहें है | हमारी चोच थक गई और मुह भी सूखता जा रहा है | हम सभी थककर चूर हो रहें है | दूसरी ओर यह महासमुद्र बार-बार भरता ही जा रहा है |”

इस प्रकार काकजातक की कथा सुनाकर, उन वृद्ध भिक्षुओं को बुलाकर समझाया, “भिक्षुओं ! राग, द्वेष और मोह के वन के कारण ही तुम्हे कष्ट हो रहा है | तुम्हे इस वन को काट देना चाहिए | तभी तुम दु:खो से मुक्त हो सकोंगे | वन को काटना ही तुम्हारा प्रथम कर्तव्य होंना चाहिए |” तुम लोग वृक्ष को काटने पर अपनी उर्जा लगा रहें हो |वृक्ष को मत काटो | एक वृक्ष को काटोंगे तो दूसरा वृक्ष निकल आयेंगा | अगर वृक्ष को काटने पर ध्यान दोगे तो एक-एक वृक्ष से उलझते रहोंगे | क्रोध काटोगे तो द्वेष रूपी वृक्ष उठ खड़ा हो जाएंगा | द्वेष को काटोंगे तो लोभ नामक वृक्ष उग आयेगा | जब लोभ को काटोगे तो पाओगे कि अब कम रूपी वृक्ष उग गया है और अब सारी शक्ति उसे काटने में लग रही है | इसलिए एक वृक्ष काटने की बजाय पूरा का पूरा वन ही काट डालो |अन्यथा मूल जहा का तहा विद्यमान रहेंगा | वन झाड़ी को काट वनरहित अर्थात वासना रहित हो जाओ |”

शाक्य मुनि ने “वन को कटने” का उपदेश दिया तो वे सभी प्रव्रजित वृद्ध भिक्षु सोच बैठ कि शास्ता ने उन्हें पेड़ काटने की आज्ञा दी है | अत: वे फरसा, कुल्हाड़ी आदि लेकर पेड़ काटने को उद्दत हुए | तब शास्ता ने उन्हें समझाया कि ‘वन’ से उनका अभिप्राय ‘वन वृक्ष’ नहीं था अपितु नुका अभिप्राय ‘राग आदि का क्लेश वन काटने का था |’ उन्होंने पेड़ काटने से मना किया और समझाया कि जैसे वन में सिह बाघ आदि का भय रहता है उसी प्रकार जीवन के क्लेशवन में भी जन्म, मरण, जरा, बीमारी आदि का भय बना रहता है | “जब तक किसी पुरुष में वासना रूपी क्लेश अणुमात्र भी बचा रहता है तब तक, दूध पीने वाले बछड़े की गाय में आसक्ति की तरह, पुरुष की भी स्त्रियों में आसक्ति बनी रहती है |”

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शरद ॠतु के पुष्पों की तरह आसक्ति को काट डालो

शरद ॠतु के पुष्पों की तरह आसक्ति को काट डालो

शरद ॠतु के पुष्पों की तरह आसक्ति को काट डालो

सुवर्णकार थेर की कथा

सारिपुत्र का एक शिष्य स्वर्णकार कुल में पैदा हुआ था | वही से उसने प्रव्रज्या ग्रहण की | सारिपुत्र ने ध्यान विपश्यना के लिए रागविरोधी कर्म स्थान बताया | उस शिष्य ने तीन महीने तक प्रयत्न किया पर सासफल नहीं हो पाया | सारिपुत्र ने उसे वही कर्मस्थान तीन बार समझाया पर वह तीनों ही बार असफल रहा | तब स्थविर ने सोचा , ‘मेरा शिष्य बुद्धिमान है, मुर्ख नहीं है | संभव है मै इसे ठीक से नहीं समझा पाया हु | अत: शाम में शास्ता के पास ले चलता हु |” ऐसा सोचकर शाम में वे उस शिष्य को शाक्य-मुनि के पास ले गए |

शास्ता ने अपनी अंतदृष्टी से समझ लिया कि यह शिष्य पिछले पाच सौ जन्मो में सुवर्णकारो के कुल में जन्म लेता रहा है और विभिन्न प्रकार के पुष्प आदि बनाता रहा है | अत: उन्होंने अपने ॠधिप्रभाव से एक सुवर्णकमल देकर उसे कहा, “भिक्षु ! विहार के सीमा प्रदेश पर जाकर इस कमल की डंडी को जमीन में गाड़कर ‘लोहितक, ‘लोहितक’ (लाल, लाल) यह शब्द बार-बार दुहराओ |” वह प्रसन्न चित्त होकर ध्यान-साधना में रत हुआ और चतुर्थ ध्यान को प्राप्त कर लिया |

अब तथागत ने अपनी शक्ति से उस कलम-पुष्प को सुखाना शुरू किया | उसे मुरझाते हुए देखकर शिष्य को जीवन की अनित्यता का बोध होने लगा | उसे अनित्यता का बोध खूब अच्छी तरह हो गया | बुद्ध ने उसके मन की प्रवृति देखि तो कंधकुटी में बैठे-बैठे उसकी ओर प्रकाश डाला | यह प्रकाश उसके मुह पर पड़ा तो उसने सोचा यह क्या है | उसे लगा मानो शास्ता उसके सामने खड़े है तथा उसे समझाया, “भिक्षु ! तृष्णा को काट दो | जिस तरह मनुष्य शरद ॠतु के कुमुद को अपने हाथो द्वारा आसानी से काट लेता है उसी तरह स्व-स्नेह को काट डालो | यह स्व स्नेह एक झटके से टूट सकता है | हिम्मत चाहिए |” फिर उन्होंने यह गाथा कही |

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सिर्फ मुर्ख ही विघ्न नहीं देखता

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सिर्फ मुर्ख ही विघ्न नहीं देखता

महाधनी व्यापारी की कथा

एक उपासक वाराणसी से कुसुम और लाल रंग में रंगे हुए कपड़ो की गाड़िया लेकर व्यापार के लिए श्रावस्ती पहुचकर रुक गया कि “कल नहीं पार करूँगा |” रात में बड़ी तेज बारिश हुई और नदी में सात दिनों तक पानी लबालब भरा रहा | वह नदी पार नहीं जा सका | अत: उसने सोचा, “मै इतनी दूर से आया हू | अगर इन वस्त्रो को फिर ढोकर वाराणसी जाऊँगा तो कोई विशेष लाभ नहीं होगा | क्यों नहीं, यही रहकर वर्षा, हेमंत और ग्रीष्म ॠतु में परिश्रम करके इन कपड़ो को यही बेच दु ?”

शास्ता ने भिक्षाटन करते समय, उसकी मन:स्थिति देखी और मुस्कुरा दिए |आनन्द ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया, “आनन्द ! इस धनी व्यापारी को देख रहें हो ?” “हा भन्ते !” “यह एक वर्ष तक की योजना बना रहा है | पर अपने जीवन पर आये संकट को नहीं देख रहा है |” “परन्तु इसके जीवन पर क्या संकट है, भन्ते !” “एक सप्ताह में इसका देहान्त हो जाएंगा |” यह कहते हुए शास्ता ने ये गाथाये कही, “पता नहीं हमारी मृत्यु कब हो जाएगी ? अत: हमे अभी तत्काल ही शुभ कर्मो में लग जाना चाहिए | उस विशाल सेना वाले यमराज से हमारी क्या प्रतिद्व्न्दिता हो सकती है ?” “दिन-रात आलस्यरहित हो उद्धोग करने वाले साधक को मुनिजन “भाद्रैकरात्र” कहते है |”

शाक्य-मुनि से अनुमति लेकर आनन्द उस महाधनिक के पास गए और उसके जीवन पर आये संकट के विषय में बता दिया | अपने कल्याण के लिए व्यापारी ने पुरे सप्ताह बुद्ध और भिक्षुसंघ को आमंत्रित कर भोजन दान दिया | शास्ता ने भक्तानुमोद्न करते हुए समझाया, “उपासक ! समझदार व्यक्ति को ‘संसार में मै इतने वर्षो तक रहकर यह महँ कार्य करूँगा’ इसी योजना नहीं बनानी चाहिए | अपने जीवन पर संकट का ध्यान रखते हुए सतत धर्म चिंतन करना चाहिए |

फिर उन्होंने यह गाथा कही |

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आसक्त व्यक्ति : मृत्यु के अधीन

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आसक्त व्यक्ति : मृत्यु के अधीन

किसा गोतमी की कथा

किसा गोतमी का प्रसंग पहले भी ‘धम्मपद’ के ‘सहस्त्रवर्ग’ (गाथा ११४) में आ चूका है | वहा शास्ता ने गोतमी को समझाते हुए कहा था, “अमृत स्थान (निर्वाण) को बिना देखे हुए सौ वर्षो तक जिन्दा रहना व्यर्थ है | उसके बजाय यदि कोई अमृत स्थान (निर्वाण) को देखकर सिर्फ एक दिन भी जीवित रहता है तो वह जीवन श्रेष्ठ है |”

शास्ता ने गोतमी को थोडा-सा सरसों लाने के लिए कहा था, सिर्फ ऐसे घर से नहीं लाना जहा कोई मर हो | दुसरे दिन शास्ता मुनि ने पूछा, “किसी गोतमी ! सरसों मिली ? “नहीं भन्ते ! इस गाव में जीवित लोगों की तुलना में मेरे हुए लोगों की संख्या अधिक है, “किसा गोतमी ने कहा | तब तथागत ने उसे समझाया, “गौतमी ! कल तुम्हे लगता था कि तुम्हारा पुत्र ही सिर्फ मृत्यु को प्राप्त हां है; परन्तु आज सरसों के माध्यम से समझ गई हो कि घर-घर की एक कहानी है | मृत्यु की ओर जाना सभी प्राणियों की स्वाभाविक गति है | मृत्युराज सभी प्राणियों को, उनका संकल्प पूरा हो या न हो, मृत्यु की तरफ उसी तरह भा ले जाता है जैसे बाढ़ सोये हुए गाव को बहाकर ले जाती है |” यह उपदेश देते हुए उन्होंने यह गाथा कही |

टिप्पणी : आसक्त पुरुष का अर्थ ऐसा पुरुष जो अपने रूप,बल,पद, आदि पर अभिमान करने लगता है तथा उनमे आसक्ति उत्पन्न के लेता है | जब नदी की बाढ़ आती है तो वह एक कुत्ते को भी बहाये बिना नहीं छोडती, उसी प्रकार प्रमादयुक्त व्यक्ति को मृत्युराज लेकर चल देते है | देशना के अंत किसा गोतमी स्त्रोताप्न्न में प्रतिष्ठित हो गई |

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