मृत्यु आगमन पर कोई बच नहीं सकता

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मृत्यु आगमन पर कोई बच नहीं सकता

पटाचारा की कथा

पटाचारा का प्रसंग पहले भी ‘धम्मपद’ के ‘सहस्त्रवर्ग’ (गाथा ११३) में आ चूका है | वहा शास्ता ने कहा था, “सांसारिक पदार्थो के उत्पाद और विनाश को न देखा जाए और सौ वर्षो तक भी जीवित रहा जाए तो वह जीना व्यर्थ ही है | इसके विपरीत यदि उत्पाद और विनाश को देखते हुए एक दिन का जीवन भी जिया जाये तो वह अधिक श्रेयस्कर है |”

पटाचारा के जीवन की कथा दु:खो की पराकाष्ठा की कथा है | उसने अपना पति गवाया, दो पुत्र खोये, माता-पिता और सभी भाई-एक ही समय काल कवलित हो गए | वह भीतर से पूरी तरह टूट चुकी थी और एसी मन:स्थिति के साथ जेतवन में शाक्यमुनि के सम्मुख उपस्थित हुई थी | ऐसे समय बुद्ध के वचन उसके लिए मरुभूमि में तरुवर की शीतल छाया के समान लगे | पटाचारा का शोक कुछ कम गा तो तथागत ने उसे समझाया था, “पटाचारे ! परलोक जाने वाले का कोई भी शरण स्थल नहीं हो सकता – न तो उसका पुत्र, न कोई सगा-संबंधी और न कोई ,मित्र | कोई किसी का रक्षक नहीं हो सकता है | अत: अंत समय में कोई भी किसी प्रकार काम नहीं आने वाला है | पुत्र, सगे-संबंधी या मित्रो का रहना या नहीं रहना दोनों ही एक समान है | इस सच्चाई को समझकर बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने शील का विशोधन कर निर्वाण के मार्ग को साफ करे ताकि वह उस मार्ग पर चल सके |”

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शीलवान निर्वाण मार्ग पर गमन करे

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शीलवान निर्वाण मार्ग पर गमन करे

पटाचारा की कथा

इसके बाद बुद्ध ने पटाचारा को संबोधित कर ये दो गाथाये सुनाई |

टिप्पणी : सांसारिक चीजों में तो पिता-पुत्र, मित्र किसी संकट में सहायक हो भी सकते है पर जब मृत्यु आ घेरती है तो उस पर किसी का वश नहीं चलता | अत: सभी असहाय हो जाते है तथा रक्षा करने में असमर्थ हो जाते है | मृत्यु आती है और इंसान को ले जाती है | मूर्ति की तरह खड़े रहकर देखने के अलावा उनके पास और कोई चारा नहीं रहता | इसलिए कहा जाता है कि मृत्यु के आने पर कोई किसी की रक्षा नहीं कर सकता है | अगर कोई रक्षा कर सकता है तो वह है- पिछले जन्म में किया गया उसका धर्म-कर्म |

इसलिए मृत्यु रूपी सांप के दंश से बचने के लिए उचित है कि मनुष्य अपने लिए ‘धर्म’ , और ‘अच्छे कर्म’ बटोरे |