नाम में क्या रखा है ?

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नाम में क्या रखा है ?

मछुआरे की कथा

यह गाथा बुद्ध ने जेतवन में एक मछुआरे, जिसका नाम आर्य था, को संबोधित कर कही थी | एक दिन उन्होंने अपनी अंतदृष्टी से देखा कि मछुआरा स्त्रोतापप्न स्थिति प्राप्त करने के लिए परीपक्व था | अत: भिक्षाटन से लौटते समय, बुद्ध अपने भिक्षुओं के साथ जब उसके पास से गुजरे तो वहा रुक गए | जब मछुआरे ने बुद्ध को देखा तो उसने मछली मारने की बंशी (मछली मारने का काटा) को फेक दिया और उनके पास आकर प्रणाम करके खड़ा हो गया | तब बुद्ध ने एक-एक कर अपने सभी भिक्षुओं का नाम उस मछुआरे की उपस्थिति में पूछा | सारिपुत्र मोग्लान सभी ने एक एक कर अपना नाम बताया | मतस्यघातक ने सोचा “संभव है, मेरा क्रम आने पर मेरा नाम भी पुंछे |” बुद्ध ने उसके मन की स्थिति को जान लिया | अत: कर्म आने पर उसका नाम भी पूछ दिया, “क्या नाम है तुम्हारा उपासक ?” मछुआरा प्रसन्न हुआ और अपना बताते हुए बोला, “भन्ते ! मेरा नाम ‘आर्य’ है |”

शास्ता ने इसे सुना और तब उससे प्रश्न किया, “तुम तो मछलियों को मारते हो, उनकी हत्या करते हो, उनके प्राण लेते हो; तुम्हारा नाम आर्य कैसे हो सकता है ? एक ‘प्राणघातक’ का नाम आर्य कैसे हो सकता है ? आर्य तो वे होते है जो प्राणियों के प्राण नहीं लेते, जीव-हत्या नहीं करते और सबों के साथ मैत्री-भाव रखते है |”

यह कहते हुए उन्होंने यह गाथा कही | देशना के पश्चात मतस्यघातक स्त्रोताप्न्नफल में स्थित हो गया |

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सभी आस्त्रोवो को समाप्त करना आवश्यक है

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सभी आस्त्रोवो को समाप्त करना आवश्यक है

कुछ भिक्षुओं की कथा

यह देशना बुद्ध ने जेतवन में कुछ शील सम्पन्न भिक्षुओं के संदर्भ में कही थी |

कथा के अनुसार एक समय कुछ भिक्षुओं ने मन में सोचा, “हमने सभी सद्गुणों को प्राप्त कर लिया है, हम शील में स्थित है; हम पवित्र जीवन जीते है; हम दूर एकांतवास करते है; हमने ध्यान साधना द्वारा शक्तिया भी प्राप्त कर ली है, सभी व्रत कर चुके है | हमारे लिए अह्र्त्व प्राप्त करना अब कठिन नहीं है; वस्तुतः हम जिस दिन भी चाहे, उसी दिन अह्र्त्व प्राप्त कर सकते है |” उन भिक्षुओं में कुछ अनागामी फल भी प्राप्त कर चुके थे | उनका भी सोचना था, “अब हमारे लिए अह्र्त्व प्राप्त करना कठिन नहीं है |”

एक दिन वे सभी शास्ता के पास पहुँचे, उन्हें सादर प्रमाण किया और आदरपूर्वक एक तरफ बैठ गए |

तब बुद्ध ने पूछा, “भिक्षुओं ! क्या तुम्हारे प्रव्रजित होने का उद्देश पूरा हो गया ?” भिक्षुगण ने उन्हें उत्तर दिया, “भन्ते ! हमने फला-फला सीढी पार कर ली है | अत: हम जब चाहे, अह्र्त्व प्राप्त कर सकते है | हम यही सोचकर साधना कर रहें है |”

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दृढ़ प्रतिज्ञा ही निर्वाण पायेंगा

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दृढ़ प्रतिज्ञा ही निर्वाण पायेंगा

कुछ भिक्षुओं की कथा

जब बुद्ध ने उनका जवाब सुना तब उन्हें समझाते हुए कहा, “भिक्षुओं ! किसी भी भिक्षु को जो शिलादि व्रत से परिशुद्ध हो चूका है या अनागामी की स्थिति में पहुच चूका है, यह नहीं सोचना चाहिए कि थोडा-सा सांसारिक दु:ख जितना बाकी है क्योकि सभी आस्त्र्वो से मुक्त हुए बिना ‘मै सुखी हु’ यह नहीं कहा जा सकता | इसके बाद तथागत ने ये दो गाथाए कही |

टिप्पणी : इन दो गाथाओ के द्वारा बुद्ध अपने शिष्यों को नसीहत देते है कि निर्वाण की साधना में रत भिक्षुओं को अपनी साधना में कदापि ढिलाई नहीं बरतनी चाहिए | थोडा कुछ प्राप्त हो गया, कुछ दूर तक पहुच कर संतोष नहीं के लेना चाहिए कि अब तो मंजिल पास है | जब चाहे पहुच सकते है | भिक्षुओं को यह भी हिदायत दी जाती है कि वे कर्म कांडो से संतुष्ट न हो जाये और न यह सोचकर संतुष्ट हो जाये कि बहुत सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है | ‘मन को जितने की कुछ सीढ़िया पार कर गया’ यह संतोष का विषय नहीं होना चाहिए |

अपने अंदर की कमजोरी जब तक पूर्णत: समाप्त नहीं हो जाएंगी, अह्त्र्व की प्राप्ति नहीं होगी | अत: अपने अंदर स्थित अशुद्धियो से मुक्त होने के लिए सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए | जिस प्रकार थोडा भी विष्ठा दुर्गन्ध देता है उसी प्रकार अल्पमात्र आश्रव भी दुःख का कर्ण होता है |

माउन्ट एवरेस्ट पर चढ़ने और उससे एक सीढ़ि निचे तक पहुचने में बहुत अंतर है | पर्वतारोही विजयी तभी कहलाता है जब वह चोटी पर पहुच जाता है | अत: जब तक मंजिल तक न पहुच जाये, संतोष न करे |

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श्रेष्ठ क्या है ?

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श्रेष्ठ क्या है ?

पांच सौ भिक्षुओं की कथा

      जेतवन का बौद्ध विहार, सांय काल की बेला थी | सूर्य देवता अस्त हो चुके थे | रात अपनी काली चादर ओढ़कर उतरने लगी थी और उधर तारे भी आकाश में टीमटीमाने लगे थे | ठंडी-ठंडी हवा मंद-मंद बह रही थी | विहार में पूर्णत: निरसता थी | शास्ता विहार में भिक्षुओं के साथ विराजमान थे | कुछ भिक्षु थोड़े समय पहले चारिका से लौटे थे तथा आसनशाला में बैठकर विश्राम कर रहें थे | साथ ही साथ आपस में कुछ इधर-उधर, कुछ घर की चर्चा भी कर रहें थे |

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मार्ग एक ही है

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मार्ग एक ही है

पांच सौ भिक्षुओं की कथा

उनकी बातचीत और साधारण लोगों की बातचीत में कोई अंतर नहीं था | सांसारिक लोगों की तरह वे भी गप्पे मार रहें थे | वरन उनकी चर्चा का विषय है – सांसारिक चीजे, सारी की सारी चर्चा अंतयात्रा से सम्बन्धित न होकर अहिर्यात्रा से ही सम्बन्धित थी | निजी अनुभूति, अपनी-अपनी साधना उनकी चर्चा का विषय नहीं था, बल्कि विषय था- “अमुक गाँव की सडक अच्छी है, अमुक गाँव की सडक अच्छी नहीं है | वहा का रास्ता कंकड़ युक्त है, पथरीला है, दूसरी जगह के रास्ते पर कंकड़ भी नही है मार्ग पथरीला भी नहीं है |”

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मार्ग पर चल सांसारिक दु:खो से मुक्त हो

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मार्ग पर चल सांसारिक दु:खो से मुक्त हो

पांच सौ भिक्षुओं की कथा

वहा की जमीन उबड़-खाबड़ है तो वहा जमीन समतल और उपजाऊ | उस रास्ते से जाने पर कांटे मिलेंगे पर फला तरफ जाने से रास्ते में कांटे नहीं मिलेंगे | उस तरफ छायादार वृक्ष है तो उस मार्ग पर कोई वृक्ष है ही नहीं |”

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कठिन तप स्वयं ही करना होगा

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कठिन तप स्वयं ही करना होगा

पांच सौ भिक्षुओं की कथा

शास्ता ने अपनी अंतदृष्टी से देख लिया कि भिक्षुओं में अह्र्त्व प्राप्ति की प्रबल संभावना है | अत: वे उन भिक्षुओं के निकट पहुँचे और आसन पर विराजमान होते हुए बोले, “तुम लोग अभी क्या चर्चा कर रहें थे ?” भिक्षुओं ने अपने मार्ग से सम्बन्धी विषय पर हुई चर्चा की जानकारी दी | तब शाक्य मुनि ने उन्हें बताया, “भिक्षुओं ! तुम तो वाह्य मार्ग की चर्चा कर रहें हो | भिक्षुओं की चर्चा का विषय तो होना चाहिए- आध्यात्मिक आर्य मार्ग | ऐसा करने से मनुष्य अपने दु:खो से मुक्त हो सकता है |”

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