कायगतास्मृति वाले शिष्य सदैव प्रबुद्ध रहते है

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कायगतास्मृति वाले शिष्य सदैव प्रबुद्ध रहते है

दारूशाकटिक पुत्र की कथा

उधर उसका बेटा बैलगाड़ी पर बैठा पिता की प्रतीक्षा कर रहा था | पिता नगर के अंदर बंद था और उसका बेटा उधर श्मशान में अकेला | बेटा गाड़ी के निचे छिपकर सो गया | राजगृह में बहुत सारे भुर-पिशाच रहते थे और बेचारा लड़का श्मशान में अकेला था | रात का अंधेरा छाते ही दो प्रेतों ने उसे देख लिया | उधर लड़के के मन में तरह तरह के विचार आने लगे | लेकिन वह शांत होकर बुद्धानुस्मृति ‘नमो बुद्धाय’, ‘नमो बुद्धाय’ का उच्चारण करने लगा | वह भयभीत नहि हुआ और शांतिपूर्वक वही लेट रहा | बौद्ध साहित्य में जिक्र आता है कि उसी समय दो प्रेत आए – एक बुद्ध शासन का विरोधी मिथ्यादृष्टी था और दूसरा सम्यगदृष्टी था जिसकी बुद्ध-शासन में प्रीति थी | उनमे से मिथ्यादृष्टी ने कहा, “यह खाने की वस्तु है | इसे खा जाना चाहिए |” सम्यगदृष्टी ने कहा, “नहीं, ऐसा करना उचित नहीं होंगा | तुम ऐसा मत करो |” पर मिथ्यादृष्टी नहीं माना, उसने उस बालक के पैर पकड़ लिए और पकडकर खीचने लगा | बालक को लग गया कि उसका पैर खीचा जा रहा है पर वह अपने स्वभाव के अनुसार ‘नमो बुद्धाय’ मंत्र का जप करने लगा | बौद्ध मंत्र सुनते ही मिथ्यादृष्टी वहा से दूर भाग खड़ा हुआ |

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अहिंसास्मृति वाले शिष्य सदैव प्रबुद्ध रहते है

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अहिंसास्मृति वाले शिष्य सदैव प्रबुद्ध रहते है

दारूशाकटिक पुत्र की कथा

तब सम्यगदृष्टी प्रेत ने मिथ्यादृष्टी प्रेत को समझाया, “हमने उस लड़के के साथ ऐसा व्यवहार करके साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है | अब हमे इसका प्रायश्चित करना चाहिए |” ऐसा कहकर वे दोनों उसकी रक्षा में बैठ गए | मिथ्यादृष्टी ने सोचा, “बच्चे को भूख लगी होगी |” अत: राजमहल गया और राजा के सोने की थाली में बालक के लिए भोजन ले आया | उस बालक के सामने भोजन रख दिया | फिर दोनों प्रेतों ने उस बालक के माता-पिता का रूप धारण कर लिया और उसे खाना खिला, रात भर उसकी रक्षा करते रहें | उन्होंने थाली बैलगाड़ी में लकड़ी के अंदर छुपा दिया |

सुबह-सुबह राजमहल में हंगामा हो गया कि ‘राजा के रसोईघर से सोने की थाली चोरी हो गई है |’ सुरक्षा की दृष्टी से नगर के सभी द्वार बंद कर दिये गये और जब नगर के अंदर थाली नहीं मिली तो राज सिपाही थाली खोजते हुए नगर के बाहर निकले | खोजते-खोजते वे बैलगाड़ी तक पहुचे और वहा बैलगाड़ी से सोने की थाली बरामद कर ली | राज सिपाहियों ने सोचा कि इसी लड़के ने चोरी की है | अत: उसे पकड़कर राजा के पास ले गए | राजा ने लड़के से पूछा, “क्या बात है ?” बालक ने कहा, “मै कुछ नहीं जानता हू | सिर्फ यह जानता हु कि रात्रि बेला में मेरे माता-पिता मेरे पास आए, उन्होंने मुझे भोजन कराया और मेरे पास बैठे रहें | मै भी श सोचकर कि ‘मेरे माता पिता मेरे पास ही बैठे है तथा मेरी रक्षा कर रहें है’ , निश्चिंत होकर रात भर सोता रहा | मै सिर्फ इतना ही जानता हु | इसके अलावा और कुछ नहीं जानता |”

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नित्यभावनास्मृति वाले शिष्य सदैव प्रबुद्ध रहते है

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नित्यभावनास्मृति वाले शिष्य सदैव प्रबुद्ध रहते है

दारूशाकटिक पुत्र की कथा

जब यह वार्तालाप चल रहा था तो उसी समय लड़के के माता-पिता वहा आ गए | राजा को सच्चाई का पता चल गया | तब वह माता-पिता और पुत्र तीनों को लेकर शाक्य मुनि के सम्मुख उपस्थित हुआ | उसने शास्ता से जिज्ञासा जाहिर कि, “भन्ते ! क्या बुद्धानुस्मृतिमात्र से कष्ट और भयो से छुटकारा पाया जा सकता है या उसके साथ-साथ धर्मानुस्मृति भी आवश्यक है ? “तब शास्ता ने स्पष्ट किया, “केवल धर्मानुस्मृति मात्र ही रक्षक नहीं होती | बल्कि जिनका चित्त छ: प्रकार से अभ्यस्त है उन्हें किसी और रक्षा कवच या मंत्रोषधि की जरूरत नहीं पडती है |”

उन छ: प्रकारों का वर्णन करने के लिए तथागत ने छ: गाथाये कही |

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संसार के आवागमन से मुक्ति ले

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संसार के आवागमन से मुक्ति ले

वज्जिपुत्रक भिक्षु की कथा

शाक्य मुनि उन दिनों वैशाली में विराजमान थे | पूर्णिमा का दिन था | कार्तिक का मास था | नगर में उत्सव का माहौल था | चारों ओर उत्सव आयोजित हो रहें थे | मधुर संगीत लहरी बह रही थी | लोग उसमे आनंद के गोते लगा रहें थे |

उसी शोर-शराबे के बिच एक वज्जिपुत्रक भिक्षु अरण्यक के विहार से निकल कर वैशाली नगर में प्रविष्ट हुआ | उत्सव के अवसर पर बजने वाले संगीत को सुनकर उसका मन उदास हो गया | उसे लगा कि वह भिक्षु का जीवन निरर्थक ही जे रहा है | इससे तो अच्छा था कि वह गृहस्थ का जीवन जीता | उसके मुह से अकस्मात निकल पड़ा, “हम लोग दूर एकांत वन में, जंगल में कटे लकड़ी के कुंदे की तरह पड़े है | हम लोगों से जैसा कौन मन्दभाग्यवाला पापी होगा जो आज एसी सुंदर रात्रि में भी इस प्रकार पड़ा हुआ है ?” यह सोचकर उसने निर्णय लिया कि अगले दिन वह प्रव्रज्या त्याग देगा तथा एक बार फिर गृहस्थ का जीवन अपना लेगा | उसके मन की बात को देखकर एक वन देवता ने सोचा कि मै इस दु:खी भिक्षु का मन शांत करूँगा | अत: उसके सामने आकर उसने यह गाथा कही : निश्चय ही आप जैसे लोग दूर, एकांत में जंगल में एक कटे हुए कुंदे की तरह पड़े हुए है | लेकिन आपकी स्थिति से अनेक लोगों को उसी प्रकार इर्षा होती है जैसे नरक में रहने वालो को स्वर्ग में रहने वालो के प्रति होती है |

सूर्योदय हुआ | वह भिक्षु शाक्य-मुनि के सम्मुख सादर प्रणाम किया और फिर एक तरफ खड़ा हो गया | शास्ता सर्वज्ञ थे | उन्होंने उसके मन की स्थिति जान ली और उसे पांच प्रकार के दु:ख गिनाये | उन्होंने गृहस्थी में होने वाले जंजाल से उत्पनन दुःख के विषय में भी बताया और तब यह गाथा कही |

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शीलवान की सर्वत्र पूजा होती है

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शीलवान की सर्वत्र पूजा होती है

चित्त गृहपति की कथा

चित्त गृहपति अनागामी था | थेर सारिपुत्र से धर्म श्रवण करके उसने यह फल प्राप्त किया था | एक बार वह कई बैलगाड़ीयो में उपहार भरकर श्रावस्ती आया और उन्हें शाक्य-मुनि एव भिक्षुसंघ को दान में दे दिया | जब वह दान दे रहा था तब आकाश से फूलो की वर्षा होने लगी | चित्त गृहपति वहा एक महिना रुका और अपने अनुचरों के साथ खुले हृदय से दान करता रहा | फिर भी उसके भंडार पुरे के पुरे भरे रहें |

जब वह वापस जाने को हुआ तो सभी बचा-खुचा सामान विहार के भंडारागार में रखवा दिया | पर उसकी बैलगाड़िया धन-धान्य से पूरी तरह भर गई | थेर आनंद को आश्चर्य हुआ और उन्होंने तथागत से पूछा, “क्या चित्त का वैभव बढ़ना आपके पास आने का परिणाम है ? क्या उसे यह लाभ सिर्फ आपके पास आने से प्राप्त हुआ है या अन्यत्र जाने से भी प्राप्त होगा ? “शास्ता ने समझाया, “ यह उपासक श्रद्धालु है, शीलवान है, रत्नत्रय के प्रति समर्पित है | अत: यह जहा भी जाता है उसे आदर-सत्कार प्राप्त होता है |”

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सत्पुरुष दूर से ही दिखते है

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सत्पुरुष दूर से ही दिखते है

चूल सुभद्रा की कथा

अनाथपिंडीक और उग्र सेठ बचपन के मित्र थे | साथ-साथ ही बड़े हुए | दोनों में प्रगाढ़ मित्रता थी यद्धपि अनाथपिंडीक बुद्ध का अनुयायी था और उग्र सेठ नंगे साधुओ का | उग्र सेठ को एक पुत्र हुआ, अनाथपिंडीक को एक पुत्री; चुल सुभद्रा नाम था उसका | दोनों ने बच्चों की शादी करने की सोची | अनाथपिंडीक ने बुद्ध से अनुमति मांगी | उग्र सेठ के धर्म के प्रति भविष्य के भाव को देखकर उन्होंने अनुमति दे दी |

विवाह सम्पन्न हो गया | अनाथपिंडीक ने विदाई से पूर्व अपनी बेटी को समझाया, “बेटी ! श्वसुर घर में रहते हुए घर की अग्नि बाहर नहीं निकालनी चाहिए |”

ससुराल में सुभद्रा के परिवारवालो तथा नागरिकों ने हृदय से स्वागत किया | एक दिन उग्र सेठ ने नागा साधुओ को निमंत्रित किया था | परिवार वालों ने उन पर श्रद्धा प्रकट की पर सुभद्रा लज्जावश उन साधुओ के पास नहीं गई, वन्दना की बात ही कौन करे ? बार-बार बुलाये जाने पर भी जब सुभद्रा नहीं आई तो श्वसुर ने आदेश दिया कि इस बहु को बाहर निकाल दिया जाये | इस पर सुभद्रा ने श्वसुर को जवाब दिया, “मेरे जैसे निर्दोष को बिना किसी कारण के बाहर नही निकाला जा सकता |” लोगों ने उग्र सेठ को समझा-बुझाकर शांत किया |

उसकी सास ने एक दिन अपनी बहु से पूछा, “तुम बुद्ध और उनके भिक्षुओं की निरंतर प्रशंसा करती रहती हो | उनके आचार-व्यवहार और गुणों के विषय में बताओ |” तब सुभद्रा ने बुद्ध एव उनके शिष्यों के गुणों का वर्णन इस प्रकार किया, “वे संयत इंद्रिय, शांत मन वाले है, वे सभी कार्य सोच-समझकर करते है, अन्दर और बाहर दोनों से स्वच्छ, शंख और मोती के समान निर्मल है | उनका आचरणीय धर्म भी पूर्णत: शुद्ध है | साधारण-जन थोडा सा लाभ पा अभिमान करने लगते है और थोड़ी सी हानी होने से दु:खी होने लगते है पर बुद्ध शिष्यों का मनोभाव हर परिस्थिति में एक जैसा रहता है | उसी प्रकार वे यश और अपकिर्ती, प्रशंसा या निंदा, सुख या दु:ख दोनों स्थितियों में एक समान रहते है | चंचल नहीं होते |”

इन बातों को सुनकर परिवार वालो ने उससे कहा, “तुम इन्हें बुलाओ | देखे तो ये कैसे है |” सुभद्रा ने बुद्ध और भिक्षुओं के लिए अगले दिन भोजनदान की तयारी करने के लिए कहा | वह स्वयं अपने महल की छत पर गई और जेतवन की ओर मुह कर, पंचाग प्रणाम कर प्रार्थना की, “भन्ते ! अपने भिक्षुओं के साथ कल मेरे घर पर भोजन दान के लिए पधारे |” ऐसा ख उसने जूही के आठ फुल आकाश की ओर फेंके | उसके परिवार वाले इस कार्य पर काफी हँसे, क्योकि जेतवन वहा से बहुत दूर था |

उधर शाक्य मुनि प्रवचन दे रहें थे | प्रवचन रोककर उन्होंने पूछा, “जूही की सुगंध आ रही है न ?” ऐसा कह उन्होंने उग्र नगर की ओर अपनी दृष्टी कर ली | उसी समय अनाथपिंडीक ने आग्रह किया, “भन्ते ! कल मेरे घर भोजन ग्रहण करे |” शास्ता ने कहा, “मै तो तुम्हारी बेटी सुभद्रा से निमंत्रित हु |” “पर उसने आपको कैसे निमंत्रित किया ? मैंने तो उसे देखा तक नहीं | मै तो यही हु |” तब शास्ता ने यह गाथा कही |

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आत्मसंयमी साधक तो अकेला ही चलेंगा

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आत्मसंयमी साधक तो अकेला ही चलेंगा

अकेले विहार करने वाले थेर के कथा

शाक्य मुनि जेतवन ने विहरते थे | विहार में अनेक भिक्षु रहकर ध्यान-साधना का अभ्यास करते थे | वे आपस में मिलते-जुलते भी थे, धर्म-चर्या भी करते थे, लेकिन उनमे एक भिक्षु इनसे सर्वथा भिन्न था | वह दुसरे भिक्षुओं से मिलता-जुलता नहीं था | वह एकांत प्रेमी था | वह अपना आसन अकेला ही कही अलग लगता था | अकेला ही उठता-बैठता था | अकेला ही कही खड़ा होता था | अकेला ही चंक्रमण करता था | वह पूर्णत: एक विहारिक था |

दुसरे भिक्षुओं को यह बात कुछ अटपटी-सी लगी | बात पुरे विहार में फ़ैल गई | ‘एक विहारिक’ भिक्षु संघ में चर्चा का विषय बन गया | भिक्षुओं ने उसके अकेलेपन की चर्चा तथागत से की | शास्ता ने उसकी चर्या को अनुचित नहीं ठहराया, वरन उसे एकाकी होकर ठहराते हुए उसे साधुवाद दिया और कहा, “भिक्षु को इसी प्रकार एकांतवासी होना चाहिए | उसे एकाकी होकर विचरण करना चाहिए | एकांत के आनंद की अनुभूति लेनी चाहिए | भीड़-भाड के आनंद से बचना चाहिए और ‘अपने साथ’ रहना चाहिए | एकासन वाला, एकशय्या वाला, आलस्य रहित होकर एकांत प्रदेश में वास करना चाहिए |”

तब शाक्य मुनि से यह गाथा कही |

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