वैर रूपी बीमारी का उपचार : प्रेम, दया, करुणा

वैर रूपी बीमारी का उपचार : प्रेम, दया, करुणा

काली यक्षिणी की कथा

एक गृहस्थ की पत्नी बाँझ थी | उसने किसी संतान को जन्म नहीं दिया | इसलिए पति के परिवार वाले उससे बहुत नाराज रहते थे तथा उसे तरह-तरह से प्रताड़ित किया करते थे | इस समस्या से मुक्ति के लिए उस स्त्री ने अपने पति का ब्याह एक दूसरी औरत से करा दिया | पर हृदय से उसे सौतन का आगमन अच्छा नहीं लगा | अत: दो अवसरों पर जब वह नइ औरत गर्भवती हुइ तब उस औरत ने उसे एक एसी दवा दे दी कि गर्भपात हो गया | तीसरे अवसर पर उसने एक एसी दवा दे दी कि उस स्त्री का उसके गर्भ के साथ ही देहांत हो गया | मरते समय उस औरत के मन में बाँझ औरत के प्रति घृणा और प्रतिशोध का भाव भरा हुआ था |

अगले जन्मो में उन दोनों में दुश्मनी का सिलसिला जारी रहा | किसी जन्म में पहली औरत दूसरी से एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्म लिया तथा दूसरी काली यक्षिणी के रूप में पैदा हुई | वैर का सिलसिला जारी रहा | पहली को एक संतान हुई | दूसरी उसे मारने के पीछे पड़ गई | पहली घबरा गई और उसने शास्ता की शरण में जाने का निर्णय लिया | उसे पता चला कि बुद्ध जेवतन में प्रवचन दे रहे है | अत: वह दौडती हुई सीधी वहा पहुची और अपनी संतान को बुद्ध कि शरण में रखकर उसने अपनी संतान की रक्षा के लिए प्राथना करने लगी | उधर यक्षिणी कि बुद्ध विहार में प्रवेश कि हिम्मत नहीं हो रही थी | बाद में बुद्धने काल यक्षिणी कोभी बुलाया तथा दोनोको समझाया | बुद्ध ने सबो को बताया कि किस प्रकार हर जन्म में वे एक-दुसरे से बदला लेती रही है और किस प्रकार वे दोनों एक दुसरे के प्रति घृणा भाव से भरी हुई है | बुद्ध ने समझाया कि किस प्रकार घृणा का अंत घृणा से नहीं होता | वरन घृणा से और अधिक घृणा का सुर्जन होता है | घृणा का अंत होता है प्रेम,दया, करुणा एवं मैत्री से | दोनों ने अपनी गलती स्वीकार की और बुद्ध के उपदेश के बाद उनके बिच का कलह समाप्त हो गया |

तब बुद्ध ने महिला को आदेश दिया कि वह अपने पुत्र को यक्षिणी की गोद में दे दे | औरत पहले तो हिचकिचाई पर बाद में बुद्ध में अटूट श्रधा और विश्वास के कारण उसने पुत्र को उसे दे दिया |

यक्षिणी ने बड़े प्यार से उस बालक को गोद में लिया और उसे चूमा मानों वह उसका ही पुत्र हो | फिर उसे उसकी माँ को वापस कर दिया | दोनों के बिच की घृणा समाप्त हो गई |

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वैर शांत करने का उपाय : क्षमा कीजिए

वैर शांत करने का उपाय : क्षमा कीजिए

स्थविर तिस्स की कथा

टिप्पणी : आज के समाज में इतना तनाव है कि अक्सर आदमी-आदमी से लड़ बैठता है | एक बार अगर किसी से लड़ाई हो जाए या एक बार भी किसी ने हमारा बुरा कर दिया तो हम अक्सर उस लड़ाई और बुराई को याद रखते है | ऐसा होने से हमारा क्रोध से हमारा क्रोध कम/समाप्त होने के बजाय और बढ़ता ही जाता है | इसके विपरीत जो लड़ाई और को याद नहीं रखते, क्षमादान कर देते हैं तथा भूल जाते है उनके जीवन से क्रोध का अंत हो जाता है | वे शांतिपूर्वक जीवन जीते है |

बुद्ध ने सदैव अपने शिष्यों एवं उपासकों को सिख दी है हर समय, हर जगह तथा हर परिस्थिति में धैर्य रखना चाहिए | कोई हमे कितना भी उद्धेलित करने की चेष्ठा करे, हमे किसी के प्रति प्रतिक्रिया नहीं दिखानी चाहिए | बुद्ध सदैव उनकी प्रशंसा करते थे जो प्रतिक्रिया स्वरूप प्रत्युत्तर दे तो सकते थे पर प्रत्युत्तर नहीं दिया और न प्रतिक्रिया व्यक्त की | “धम्मपद” में बहुत जगह इसका दृष्टांत आया है कि बुद्ध ने उनको भी क्षमादान दिया जो उन्हें अपमानित या निन्दित किया करते थे | क्षमा कमजोरी का लक्षण नहीं है | वरन यह हमारे अंदर विद्यमान आतंरिक शक्ति का द्दोतक है |

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वैर शांत करने के उपाय

वैर शांत करने के उपाय

स्थविर तिस्स की कथा

तिस्स स्थविर वृद्धावस्था में प्रव्रजित हुए थे | वे शास्ता के रिश्तेदार थे और अपने सबंध को कभी भूल नहीं पाते थे | वे स्थूल शरीर वाले थे तथा भिक्षु के कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करते थे | बाहर से आने वाले युवा भिक्षु उनकी उम्र का ख्याल कर उनकी सेवा करते थे पर जल्द ही उन्हें पता चल जाता था कि तिस्स का ज्ञान असंपूर्ण है तथा वे अपनी साधना तथा अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित नहीं है | शास्ता के साथ अपने संबंधो को पृष्ठभूमि में रख, वे अक्सर युवा भिक्षुओं से लड़ पड़ते थे | उनके इस प्रकार के व्यवहार पर यदि कोई डांटता तो वे रोने लगते और उस व्यक्ति की शिकायत लेकर शास्ता के पास जा पहुचते थे | शास्ता सभी बाते सुन तिस्स को समझाने की कोशिश करते कि गलती उनकी थी पर तिस्स इस बात को समझने के लिए राजी नहीं होते | इसके अलावा दुसरो के साथ हुए दुर्व्यवहार को अपने ह्र्द्य में गांठ बांध कर रख लेते थे |

`बुद्ध ने शिष्यों को समझाते हुए बताया “ जो व्यक्ति दुसरो द्वारा किए गए दुर्व्यवहार को यद् रखता है, उसे भूल नहीं जाता और न भूलने की चेष्ठा करता है उसके जीवन से वैर का कभी अंत नहीं होता है | इसके विपरीत जो व्यक्ति दुसरों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार को भूल जाता है, उसे याद नहीं रखता उसके जीवन से वैर का सदा के लिए अंत हो जाता है | “

ऐसा समझाते हुए बुद्ध ने ये दो गाथायें कहीं |

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किसे सार प्राप्त होता है ?

किसे सार प्राप्त होता है ?

 स्थविर सारिपुत्र की कथा

इस प्रकार विचार कर दोनों अपनी-अपनी साधना में लग गए | उसी समय शाक्य मुनि राजगुह पधारे | वे वेणुवन में रह रहे थे | उनके साथ पंचवर्गीय भिक्षुओ में से अश्वजित नाम का भी भिक्षु आया | उसने किसी दिन भिक्षाटन के लिए नगर में प्रवेश किया | उसी समय उपतिस्य भी भिक्षाचर्या हेतु निकल पड़ा | रास्ते में उपतिस्य ने अश्वजित को देखकर मन ही मन सोचा, “मैंने आज तक ऐसा तेजस्वी परिवाज्रक नहीं देखा है | क्यों न मै इससे बाते करू तथा इसके आचार्य आदि के बारे में पुछु ? “अत: सही अवसर पाकर उपतिस्य अश्वजित के पास गया तथा उनसे उनके बारे में पुछा | अश्वजित स्थविर ने “जो धर्म हेतु उत्पन्न है” गाथा सुनाई | दो पद सुनते ही उपतिस्य स्त्रोतापन हो गया | फिर आचार्य ने शाक्य मुनि के विषय में बताया जो उस समय राजगृह के वेणुवन में वास कर रहे थे | उपतिस्य ने अश्वजित से आज्ञा ली और कोलित के पास गया तथा उसे भी स्थविर द्वरा सुनाई गई गाथा सुनाई | उसे सुनते ही वह भी स्त्रोतापन हो गया | तब दोनों मित्रों ने शाक्य मुनि के पास जाकर उनसे आशीर्वाद लेने का विचार किया | सोचा “अपने आचार्य संजय को भी साथ ले चलते है |” ऐसा सोचकर दोनों शिष्य संजय के पास गये तथा उससे शाक्य मुनि के पास चलने के लिए आग्रह किया | पर संजय इसके लिए तैयार नहीं हुआ | जब शिष्यों ने इसका कारण पूछा तो संजय ने उत्तर दिया, “मैंने उच्च कुल के महाजनों का गुरु बनकर अभी तक जीवन यापन किया है | अब मेरे लिए किसी का शिष्य बनना असंभव है |” दोनों शिष्यों ने समझाने की पूरी कोशिश की पर संजय तैयार नहीं हुआ तथा उनसे कहा, “संसार में बुद्धिमान की तुलना में मुर्ख अधिक है | अत: बुद्धिमान अगर शाक्य मुनि के पास जायेंगे तो मुर्ख तो मुर्ख मेरे ही पास आयेंगे | “ ऐसा सुन उपतिस्य और कोलित दोनों शास्ता से मिलने चल पड़े | संजय के अधिकांश शिष्य भी उन दोनों के पीछे ही लिए | संजय यह आघात बर्दाश नहीं कर पाया और वहीं तुरंत उसकी मृत्यु हो गयी | उधर उपतिस्य और कोलित शास्ता के पास पहुचे और उनसे प्रव्रज्या की पार्थना की | शास्ता ने दोनों को प्रव्रज्या दी | उन्होंने बुद्ध को बताया कि किस प्रकार उन्होंने बहुत कोशिश की कि संजय त्रिरत्न की शरण में आये पर वह तैयार नहीं हुआ | कुछ दिनों बाद कोलित (महामोग्लान के रूप में) तथा उसके बाद उपतिस्य (सारिपुत्र के रूप में) अहर्त हो गयें |

शाक्य मुनि ने समझाया, “अपनी गलत दृष्टि के कारण संजय एक मुर्ख की तरह असार को सार और सार को असार समझ बैठा था | इसके विपरीत मोग्लान तथा सारिपुत्र समझदार थे और उन्होंने असार को असार तथा सार को सार समझ लिया था |”

तब शास्ता ने ये दो गाथाये सुनाई |

आगे चलकर महामोग्लान तथा सारिपुत्र दोनों ही तथागत के प्रधान तथा श्रेष्ठ शिष्य बन गये |

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किसे सार प्राप्त नहीं होता ?

 किसे सार प्राप्त नहीं होता ?

स्थविर सारिपुत्र की कथा

शाक्य-मुनि के पृथ्वी पर पदार्पण के पहले से ही राजगृह के पास उपतिष्य तथा कोलित नाम के दो गाव थे | जिस दिन उपतिष्य गाव की | ‘सारी’ नामक ब्राह्मणी ने गर्भधारण किया, उसी दिन कोलित गाव की ‘मोग्गली’ नाम की ब्राह्मणी ने गर्भधारण किया | यह संयोग की बात थी कि दोनों ब्राह्मणी ने एक ही दिन गर्भधारण किया | इन दोनों परिवार में सात पीढीयों से गाढ़ी मित्रता थी | समय आने पर दोनों परिवार में पुत्र पैदा हुए | सारी ब्राह्मणी के पुत्र का नाम उपतिष्य रखा गया और मोग्गली के पुत्र का नाम कोलित रखा गया | उम्र आते ही वे दोनों सर्वगुणसंपन्न हो गए |

उन दिनों राजगृह में प्रत्येक वर्ष ‘गिरिजसमज्ज’ नामक मेला लगता था | दोनों मित्र एक ही मंच पर बैठकर मेला देखते | हँसनेकी बात बर हँसते थे, उदासी की बात पर उदास होते थे तथा दान देने के अवसर पर उचित दान देते थे | इस प्रकार एक बार, अपने प्रारंभ के अनुसार, वे हसने की बात पर भी चुप रहे, रोने की बात पर भो मौन रहे तथा दान का अवसर आने पर भी कुछ नहीं किया | वे दोनों चुपचाप कुछ इस प्रकार सोचते रहे, “इस मेले में क्या रखा है ? सौ साल के अन्तराल में सब कुछ ही ख़त्म हो जायेंगा | हमे तो इस संसार रूपी मेले में क्या रखा है ? समय के अन्तराल में सब कुछ नष्ट हो जायेंगा | अत: मै सोच रहा हु कि इससे मुक्ति कैसे मिले | परंतु मित्र ! आज तो तुम भी उदास बैठे हुए हो | तुम्हारी उदासी का क्या कारण है ? “ कोलित ने कहा, “बंधू ! मै भी वहीं सोच रहा हु जो तुम सोच रहे हो | हम दोनों की ही सोच ठीक है | पर मुक्ति के लिए तो प्रव्रज्या लेनी होगी | किससे प्रव्रज्या ली जाए ?”

उन दिनों राजगृह में संजय नाम का एक परिव्राजक अपने शिष्यों के विशाल समूह के साथ रहता था | उपतिषय तथा कोलित ने उसी से प्रव्रज्या लेने का विचार किया | वे उसके पास गए, उससे प्रव्रज्या ग्रहण की और बहुत जल्द ही संजय द्वारा बताये सारे सिधान्तों को पूरी तरह ह्दयगम कर गए | तब उन्होंने संजय से पूछा, “आचार्य ! हमने आपके द्वरा बताये सारे सिधान्तों को ह्दयगम क्र लिया | अब आगे कुछ बताईए |” “आगे बताने के लिए कुछ नहीं है | जितना मालूम था, उतना बता दिया |” यह सुनकर दोनों मित्रो ने राय की, “इस आचार्य के पास रहने से कोई फायदा नहीं है | आर्यावर्त बहुत विशाल देश है | अगर हम यहाँ घूमेंगे तो निश्चय ही कोई न कोई सही आचार्य मिल जाएगा |” ऐसा सोचकर दोनों मित्र पुरे जम्बूद्वीप घुमते रहे | उन्हें एक के बाद एक आचार्य मिलते गए पर जब उन आचार्यो से शंका समाधान के लिए प्रश्न करते तो वे उत्तर नहीं दे पाते थे | कुछ समय के बाद उन दोनों ने अनुभव किया कि अब और भटकना बेकार है | अत: हार-थककर वे राजगृह वापस आ गए और परस्पर निर्णय लिया, “हममे से जिसको भी सत्य की पहले अनुभूति होंगी, वह दसरे को तुरंत सूचित करेगा |”

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किसके चित्त में राग नहीं घुसता है ?

किसके चित्त में राग नहीं घुसता है ?

नन्द स्थविर की कथा

उधर भूप ने जब सुना कि राजकुमार पुर के द्वार तक आ पहुचे है और भिक्षार्थ नीचों के आगे हाथ फैला रहे है तो नृप स्वेत मूंछो को एठते, दांत पीसते, तुरंग पर सवार हो, रोष सहित महल से निकले | पर बुद्ध के सम्मुख पहुचते ही क्रोध लुप्त हो गया; तथापि इतना कहा कि, “पुत्र! यह राजपाट, वैभव आदि सब तुम्हारा है | तुम्हे यहाँ इसी गौरव गरिमा के साथ आना चाहिए था | “शाक्य मुनि ने उत्तर दिया – “ हे तात ! मर्त्यो की कोई कुल परंपरा होती ही नहीं, कुल परंपरा तो ‘बुद्ध – अवतारों की होती है |”

तत्पश्चात शास्ता ने महाराज को मोक्ष के आठ सोपान समझाये | इस प्रकार उस रात राज-कुल ने शांति मार्ग पर चलने हेतु मंगलमय प्रवेश किया | राजा शुधोद्न स्त्रोतापतिफल में प्रतिष्ठित हो गए | बुद्ध की मौसी मा महापजापति गौतमी ने भी स्त्रोतापतिफल प्राप्त क्र लिया | शाक्य मुनि ने राहुल की माता के सद्गुणों का जिक्र कर चन्दकित्रनी जातक सुनाया |

तीसरे दिन तथागत के छोटे भाई नन्द का विवाह था |

भोजनोपरांत चलने के समय नन्द ने तथागत का भिक्षा पात्र उठाया | बुद्ध ने नन्द के हाथ से अपना पात्र वापस नहीं लिया | वे अपने आसन से उठे और विहार की ओर चल दिए | सिस्ठाचारवश नन्द उनका पात्र लिए पीछे-पीछे चलता गया | शाक्य मुनि चलते गए, रुके नहीं | उधर होने वाली पत्नी, जनपदकल्याणी भी नन्द के पीछे-पीछे दौड़ती गई और बोलती गई , “आर्यपुत्र ! जल्द लौट आइयेगा |” विहार पहुचने पर तथागत ने नन्द से प्रश्न किया, “नन्द,प्रव्रजित होवोगे ?” नन्द ‘ना” नहीं कह सका और प्रव्रजित हो गया |

इधर माँ के कहने से राहुल भी शास्ता के पास गया और अपना हक मांगने लगा | तब शास्ता ने राहुल को भी प्रव्रजित कर दिया | राजा शुधोद्न को जब पता चला तो उन्हें बहुत दु:ख हुआ | उन्होंने तथागत से आग्रह किया कि भविष्य में माता-पिता की अनुमति के बिना बच्चो को प्रव्रजित नहीं किया जाए | शास्ता ने राजा को यह आश्वासन दिया और विनय का नियम बदल दिया |

उधर प्रव्रजित होने पर नन्द को जनपदकल्याणी के शब्द बार-बार याद आ रहे थे | उसका मन साधना में नहीं लग रहा था | उसने बुद्ध से चीवर छोड़ने का आग्रह किया | तथागत ने उससे कहा कि अगर वह तन्मयता से साधना करेगा तो वे जनपदकल्याणी से भी सुंदर स्त्री दिला देंगे | नन्द ने स्वीकृति दे दी और साधना करते-करते नन्द अह्र्त्व प्राप्त क्र गया | अब उसे किसी स्त्री में कोई रूचि नही रह गई थी | नन्द के अह्र्त्व प्राप्त करने से अब शाक्य-मुनि भी वचनबद्ध नही रह गए थे |

तब शाक्य-मुनि ने ये दो गाथाये सुनाई |

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किसके चित्त में राग घुसता है ?

किसके चित्त में राग घुसता है ?

नन्द स्थविर की कथा

राजकुमार सिद्धार्थ गृहत्याग (महाभिनिष्क्रमण) के बाद छ: वर्षो तक गहरी साधना करते रहे और अंततः उन्होंने बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे सत्य के दर्शन किए |

इन अनेक वर्षो में महाराज शुधोद्न शाक्य –नायको के मध्य खिन्न मन से किस प्रकार दिन काटते रहे कोई नहीं जनता | यशोधरा ने भी अपने –अपने तरीके से राजकुमार सिद्धार्थ की खूब खोज –खबर करवाई, पर सब व्यर्थ गई | एक दिन यशोधरा के मुह से जब यह बात निकली कि ‘अब मै थोड़े दिन की मेहमान हू ‘तब ही अनुचरियो ने सूचना दी कि नगर के दक्षिण तोरण से आए दो व्यापारी कह रहे है कि उन्होंने ‘शाक्य कुमार’ को देखा है | वे जगदारादय राजकुमार अब अति शुद्ध महान ‘बुद्ध’ बन चुके है और इसी ओर आ रहे है | यह सुनते ही यशोधरा ने, इससे पहले कि उन्हें महाराजा अपने पास बुलावा पाते, दूतो के माध्यमसे उन्हें अपने महल में बुलवा लिया | पूछने पर ‘त्रपुत्र’ नामक व्यापारी बोला – “हे देवी ! हम उन्हें अपनी आँखों से देख कर आ रहे है | वे तो राजाओं के भी राजा बन चुके है | नगर- नगर, गाव -गाव जाकर वे जैसे –जैसे उपदेश देते है, लोग उनका अनुसरण कर सुख और शांति पाते है | हमने ‘गया” के निकट क्षिरिका – वन में उनके उपदेश सुने है | चौमासे के पहले ही वे यहा आ पहुचेंगे |” इसके बाद ‘भल्लिक’ ने सविस्तार वृतांत सुनाया और बताया कि अब उन्हें ‘बुद्ध’ नाम से सम्बोधित किया जाता है | वे लोगो को “अष्टांगमार्ग” और “द्वादश निदान” सुझाते है | ज्ञानप्राप्ति पर उन्हें पंचवर्गीय भिक्षुओं का ध्यान आया और वे तुरंत वाराणसी की और चल पड़े | वहां उन्होंने धर्म चक्र का ज्ञान दिया, साथ में “मध्यमा प्रतिपदा”, आर्यसत्य” और “अष्टांगमार्ग” में भी दीक्षित किया | इन पांच में से सर्वप्रथम “कौडिन्य” नमक शिष्य दीक्षित हुआ, बाद में “महानाम” , “भद्रक”, “वासन” और “अश्वजित” दीक्षित हुए |

फिर वाराणसी का “यश” नामक नगर सेठ प्रव्रज्या का अधिकारी बना | यही से बुद्ध ने साठ भिक्षुओं को प्रचार हेतु भेजा | फिर राजगृह के निकट “यष्टिवन” पहुचे जहा महाराज बिंबसार ने परिजनों सहित उनकी शरण ग्रहण की | इतना कह, यशोधरा से विदा ले दोनों व्यापारी चल दिए | यह समाचार सुने तो महाराजा ने तथागत को लिवा लाने के लिए नौ सामंतो को भेजा | वे वेणुवन पहुचे पर तथागत के उपदेश सुन सबकुछ भूल गए और उनके धर्म संघ में शामिल हो गए | तब उन्होंने अपने सचिव के सूत व सिद्धार्थ के बाल सखा को भेजा | वह भी उनके सम्मुख जाते ही भिक्षु बन गए | पर अवसर देख कपिलवस्तु चलने की प्रार्थना की इ बुद्ध कपिलवस्तु पहुचे और निकट जाते ही यशोधरा अधीर हो उनके चरणों पर गिर पड़ी | उन्होंने वहीं यशोधरा को दीक्षा दे स्थिर –चित्त किया | बाद में एक भिक्षु ने शंकालु हो प्रश्न किया कि आपने यशोधरा को अपना आलिंगन क्यों करने दिया | शास्ता ने उत्तर देते हुए समझाया कि महा प्रेम लघु प्रेम को इसी भांति सहारा देता है |

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