मार्ग पर चल सांसारिक दु:खो से मुक्त हो

1011

मार्ग पर चल सांसारिक दु:खो से मुक्त हो

पांच सौ भिक्षुओं की कथा

वहा की जमीन उबड़-खाबड़ है तो वहा जमीन समतल और उपजाऊ | उस रास्ते से जाने पर कांटे मिलेंगे पर फला तरफ जाने से रास्ते में कांटे नहीं मिलेंगे | उस तरफ छायादार वृक्ष है तो उस मार्ग पर कोई वृक्ष है ही नहीं |”

105

103

 

कठिन तप स्वयं ही करना होगा

88

कठिन तप स्वयं ही करना होगा

पांच सौ भिक्षुओं की कथा

शास्ता ने अपनी अंतदृष्टी से देख लिया कि भिक्षुओं में अह्र्त्व प्राप्ति की प्रबल संभावना है | अत: वे उन भिक्षुओं के निकट पहुँचे और आसन पर विराजमान होते हुए बोले, “तुम लोग अभी क्या चर्चा कर रहें थे ?” भिक्षुओं ने अपने मार्ग से सम्बन्धी विषय पर हुई चर्चा की जानकारी दी | तब शाक्य मुनि ने उन्हें बताया, “भिक्षुओं ! तुम तो वाह्य मार्ग की चर्चा कर रहें हो | भिक्षुओं की चर्चा का विषय तो होना चाहिए- आध्यात्मिक आर्य मार्ग | ऐसा करने से मनुष्य अपने दु:खो से मुक्त हो सकता है |”

89

90

सभी संस्कार अनित्य है

85

सभी संस्कार अनित्य है

अनित्य-लक्षण की कथा

शाक्य मुनि जेतवन में थे | उसी समय कुछ भिक्षु आये | वे उनसे ध्यान-साधना सीखकर साधना के उद्देश से वन को प्रस्थान कर गए | वे एकांत में साधना करते रहें | पर बहुत प्रयत्न करने पर भी उनकी कोई विशेष प्रगति नहीं हुई | उन्होंने सोचा कि शायद ध्यान-साधना सिखाने में कोई कमी रह गई है | फिर से चलकर सिख लेते है |

शाक्य मुनि ने अपनी दिव्यदृष्टी से जन लिया था कि ये भिक्षु अनित्य की भावना पर ध्यान करने के पथ पर अग्रसर है | अत: उन्होंने भिक्षुओं को समझाया , काम भाव आदि में सभी संस्कार उत्पन्न होकर अभाव को प्राप्त होने के कारण अनित्य ही है |” उन्होंने आगे स्पष्ट किया, “आदमी जब ऐसा विपश्यना प्रज्ञा द्वारा जान जाता है तब वह इस स्कन्धपरिहरण दुःख से निर्वेद वैराग्य पैदा करता है | अर्थात वैराग्य होने से दुःख क्षेत्र के प्रति भोक्ताभाव टूट जाता है, दुःख के साक्षात्कार से सत्य का ज्ञान करता है |” ऐसा है यह विमुक्ति का मार्ग | ऐसा समझाते हुए उन्होंने यह गाथा कही |

86

87

सारे संसार दुःखमय है

82

सारे संसार दुःखमय है

दुःख लक्षण की कथा

यह दूसरी गाथा भी जेतवन में उन्ही भिक्षुओं के संदर्भ में कही गई है |

कुछ समय बाद एक दिन शाक्य मुनि ने अपनी अंतदृष्टी से देखा कि इन भिक्षुओं में दुःख लक्षण भावना है तो फिर उन्होंने भिक्षुओं को बुलाया और उनसे बोले, “भिक्षुओं ! सभी संसार प्रतिपिडीत होने के कारण दुःखमय है | यह सारा संसारही दुःखमय है | यहा संसार में सुख की कोई किरण नहीं है | जिस दिन समझ लोगे कि सभी संसार ही दुःख-स्वरूप है | उस दिन से तुम दु:खो से छुटकारा पाने लगोंगे | प्रज्ञा से जब यह पहचान लोगे तो सभी दु:खो से मुक्ति हो जायेंगी | यही निर्वाण का मार्ग है, यही चित्त के विशुद्धि की राह है | अत: मनुष्य को समझने की कोशिश करनी चाहिए कि सारे संस्कार दुःखदायक है अर्थात जो उत्त्पन होता है, वह नाशवान होने के कारण दुःखदायी है | इस सच्चाई को जब कोई विपश्यना ज्ञान से देख लेता है, जान और समझ लेता है अर्थात दुःख क्षेत्र के प्रति भोक्ताभाव टूट जाता है – तब वह विशुद्धि (विमुक्ति) का मार्ग प्राप्त कर लेता है |”

तब शास्ता ने यह गाथा कही |

83

84

सभी धर्म अनात्म है

79

सभी धर्म अनात्म है

अनात्म लक्षण की कथा

यह धर्मदेशना भी शास्ता ने उन्हें भिक्षुओं के संदर्भ में जेतवन में कही थी |

एक दिन शाक्य-मुनि में उन्हें सम्बोधित करते हुए समझाया, “भिक्षुओ ! सभी धर्म (पंचस्कन्ध) अनास्त है | आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है | न तो तुममे और न ही इन चीजो में कोई आत्मा है | आत्मा से भाव होता है किसी चिरस्थायी, शाश्वत, स्थिर चीज का | पर इस जगत में चिरस्थायी, शाश्वत, स्थिर नाम की तो कोई चीज है ही नहीं | सभी कुछ स्कन्ध के अलावा और कुछ नहीं है | मनुष्य कुछ और नहीं है – सभी स्कन्धो को मिलाकर, जोड़-जोडकर बनाया गया एक पुतला है | इस धर्म को जनों, इस सच्चाई को पहचानो | इस धर्म के स्वरूप को जन जाओगे तो समझ जाओगे कि आत्मा-परायण या ईश्वर पारायण से विशुद्धि का मार्ग है | अर्थात साधक को समझने की चेष्टा करनी चाहिए कि ‘सभी धर्म अनात्म है यानि लौकिक या कोलोत्तर, जो कुछ भी है, वह सब अनात्म है, ‘मै’ , ‘मेरा’ नहीं है | इस सच्चाई को जब कोई विपश्यना प्रज्ञा द्वारा जान लेता है, देख लेता है तब उसको सभी दु:खो से निर्वेद प्राप्त हो जाता है अर्थात दुःख क्षेत्र के प्रति भोक्ताभाव टूट जाता है | ऐसा अदभुत है यह विशुद्धि (विमुक्ति) का मार्ग |”

80

81

आलसी प्रज्ञा के मार्ग को प्राप्त नहीं कर सकता

76

आलसी प्रज्ञा के मार्ग को प्राप्त नहीं कर सकता

योगाभ्यासी तिस्स थेर की कथा

जेतवन में एक समय बहुत सारे कुलपुत्र शास्ता से प्रव्रजित हुए | उनसे प्रव्रज्या ग्रहण कर ध्यान-साधना की विधि सिख जंगल की ओर तपस्या करने हेतु प्रस्थान कर गए | उनमे से सिर्फ तिस्स नाम का एक भिक्षु विहार में रह गया |

वन में उन भिक्षुओं ने सतत साधना की, घोर तपस्या की और सभी ने अह्र्त्व प्राप्त कर लिया | वे सभी वन से शाक्य-मुनि से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए चल पड़े | अपनी उपलब्धी से वे बहुत प्रसन्न थे | हृदय उमंग और उत्साह से भरा हुआ था | रास्ते में किसी उपासक ने उन्हें भोजन-दान दिया और अगले दिन के लिए भी आमंत्रित कर दिया |

श्रावस्ती पहुचकर, विहार में पात्र-चीवर रखकर इन सफल भिक्षुओं ने संध्या बेला में शास्ता को सादर प्रणाम किया और अपने विषय में बताया | शाक्य-मुनि ने उनके कार्य और उपलब्धी पर संतोष व्यक्त किया और उनका स्वागत सत्कार किया |

अहर्त रहित भिक्षु तिस्स ने सोचा, “शास्ता के पास इन सफल भिक्षुओं के स्वागत के लिए शब्दों की कमी पद रही है और इसकी विपरीत मुझे कहने के लिए उनके पास एक भी शब्द नहीं है क्योकि मैंने अह्र्त्व प्राप्त नहीं किया | मै आज ही अह्र्त्व प्राप्त करूँगा |”

तिस्स ने रात भर अह्र्त्व प्राप्ति हेतु चंक्रमणत्व किया | इससे थककर वह एक पत्थर पर गिर गया और उसके जांघ की एक हड्डी टूट गई | वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा | उसकी आवाज सुन भिक्षुगण दौड़े-दौड़े आए और उसकी मरहम पट्टी की | इलाज करते-करते सुबह हो गई | वे उपासक के पास पुन: भोजनदान हेतु नहीं जा पाये | शास्ता को इस बात की जानकारी हुई | उन्होंने बताया कि पूर्व जन्म में तिस्स तुम्हारे लिए व्यवधान बन चूका था | उन्होंने यह भी समझाया, “भिक्षुओं ! जो परिश्रम करने के समय परिश्रम (उद्धोग) नहीं करता उस समय उत्साहहीन मन वाला होकर बैठा रहता है, वह आलसी समय के अंतराल से ध्यान आदि में कोई विशिष्ट उपलब्धी प्राप्त नहीं कर पाता |

इस प्रसंग में उन्होंने यह गाथा कही |

77

 

78

मन वचन और शरीर को शुद्ध करे

73

मन वचन और शरीर को शुद्ध करे

शूकर प्रेत की कथा

एक बार महामोग्गलान और लक्ष्मण थेर गृधकूट पर्वत से निचे उतर रहें थे | महामोग्गलान मुस्कुराये तो लक्ष्मण थेर ने इसका कारण पूछा | उन्होंने कहा कि विहार चलकर शास्ता के सामने यह प्रश्न पूछना |

दोनों विहार पहुंचे | शाक्य मुनि की उपस्थिति में लक्ष्मण थेर ने यह प्रश्न पूछा | तब महामोग्गलान ने बताया कि उन्होंने एक प्रेत देखा था जिसका शरीर तो मनुष्य की तरह था पर सिर सूअर की तरह था | यह सुनकर तथागत बोले, “मैंने भी इस प्रेत को बोधिवृक्ष के निकट देखा था पर उस समय किसी से नहीं कहा था क्योकि अगर मै किसी से कहता और विश्वास नही करता तो अपने लिए गलत कर्म का सुर्जन कर लेता | महामोग्गलान सच ख रहें है |”

शिष्यों ने उसके पूर्व जन्म की गति जाननी चाही कि वह कैसे इस योनी में प्रकट हुआ | तब बुद्ध ने यह कथा सुनाई |

प्राचीन काल में काश्यप बुद्ध के समय दो भिक्षु, एक साठ साल का और एक उनसठ साल का, जिनमे परस्पर गाढ़ी मैत्री थी, एक साथ एक विहार में रहते थे | वहा एक धम्मकथा सुनाने वाला आया | वे उसे गावो में धर्मकथा सुनांने के लिए ले जाने लगे | इन दोनों स्थविरों के सरल स्वभाव को देखकर धर्मकथित ने सोचा, ‘क्यों न इनमे फुट डालकर, इन्हें विहार से निकाल दु तथा यह विहार हथिया लु |” ऐसा सोचकर वह दोनों स्थविरों से अलग-अलग एक दुसरे की चुगली करने लगा | स्थविरों को उसके षड्यंत्र का भान न हुआ और वे दोनों आपस में लड़ बैठे ओर विहार से निकल गए | वर्षो बाद दोनों कही पर फिर एक साथ मिले और रो पड़े | आपस की बातचीत से पता चला कि किस प्रकार उस धर्मकथित ने उनके अंदर फुट डाली थी | वे दोनों विहार लौटे और मार-मार कर उस धर्मकथित को विहार से बाहर निकाल दिया | पर धर्मकथित ने इतना बड़ा पाप किया था कि उसके द्वारा किया गया पुण्य भी उसे नहीं बचा पाया | वह नरक लोक में जा गिरा और शूकर की योनी में जन्म लिया | शास्ता ने शिष्यों को समझाया, “मनुष्य को मन, वचन और कर्म से सदा शांत आचरण करना चाहिए |”

74

75